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05-15-2017, 03:53 PM   #1
Administrator
 
 




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05-15-2017, 03:59 PM   #2
Administrator
 
 

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شبهاتهم من السنة النبوية على عدم عصمة النبى صلى الله عليه وسلم
فى عقله وبدنه والرد عليها

ويشتمل على تمهيد وخمسة مطالب :
المطلب الأول : شبهة الطاعنين فى *ديث "شق صدره صلى الله عليه وسلم " والرد عليها0
المطلب الثانى : شبهة الطاعنين فى *ديث "فترة الو*ى" والرد عليها0
المطلب الثالث : شبهة الطاعنين فى *ديث "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" والرد عليها0
المطلب الرابع : شبهة الطاعنين فى *ديث "س*ر رسول الله صلى الله عليه وسلم " والرد عليها0
المطلب الخامس : شبهة الطاعنين فى *ديث "أَهَجَرَ" والرد عليها0
تمهيـــد

بعد أن ت*ايل أعداء الإسلام، وأعداء السنة والسيرة العطرة، على بعض آيات من القرآن الكريم، لي*وروا معانيها، ويستدلوا بهذا الت*وير على عدم عصمة سيدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فى قلبه، وعقيدته، وخلقه، تجدهم هنا باسم السنة ونصوصها يستشهدون بها أيضاً على إنكار *جتها، وإنكار مصدريتها التشريعية، فى ت*ديد شخصية وسيرة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، بزعم أن فيها أ*اديث ص*ي*ة يفيد ظاهرها – فى نظرهم – عدم عصمته صلى الله عليه وسلم ويشوه سيرته، وهذا رأى الشيعة ممن تغالوا فى فهم العصمة0

وفريق آخر يشترك مع سابقه فى إنكار *جية السنة، وإنكار مصدريتها التشريعية فى فهم سيرة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، إلا أنه فى نفس الوقت يستشهد من ظاهر نصوص السنة والسيرة ما يفيده فى زعمه ودعواه بعدم عصمته صلى الله عليه وسلم فى قلبه وعقيدته0

وهكذا عكس المشاغبون القضية، ونظروا فى السنة المطهرة والسيرة العطرة فما وافق دعواهم منها قبلوه، واعترضوا به على منازعيهم، وا*تجوا به مع وضعه أو ضعف دلالته على ما يزعمون0
وهذا العمل مع جهالته، أخطر منطق عكسى فى التدليل على فساد الشئ بمادته، نصاً وأسلوباً0
لأنه إذا كان من الخطأ والخطر قبول الأ*اديث الباطلة والموضوعة، وعزوها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فمثله فى البطلان رد الأ*اديث الص*ي*ة الثابتة، بالهوى، والعجب، والتعالم على الله ورسوله، وسوء الظن بالأمة، وعلمائها، وأئمتها، فى أفضل أجيالها وخير قرونها0

إن قبول الأ*اديث المكذوبة يدخل فى الدين، وفى سيرة رسول الله صلى الله عليه وسلم ما ليس منها0
أما رد الأ*اديث الص*ي*ة، فيخرج من الدين، ومن سيرة النبى صلى الله عليه وسلم ما هو منها. ولا ريب أن كليهما مرفوض مذموم، قبول الباطل، ورد ال*ق0
ولأعداء الإسلام، والسنة المطهرة، والسيرة العطرة، شبهات على عدم عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم فى قلبه وعقيدته، بنوها على أ*اديث مكذوبة، وضعيفة، وأخرى ص*ي*ة مع ضعف دلالتها على ما ا*تجوا به0
وسوف أذكر تلك الشبهات مع الرد عليها فى المطالب التالية، فإلى بيان ذلك، سائلاً المولى عز وجل التوفيق والسداد0
المطلب الأول
شبهة الطاعنين فى *ديث "شق صدره صلى الله عليه وسلم "
والرد عليها

يذهب أعداء الإسلام من المستشرقين، وأذيالهم من أعداء السنة المطهرة إلى إنكار الشق ال*سى لصدر رسول الله صلى الله عليه وسلم () فبعض المستشرقين مثل "نيكولوسون" يرجعه إلى *الة عصبية كانت تنتابه صلى الله عليه وسلم فى فترات متقطعة() بينما تجد "موير" يوافقه ويزيد عليه أنها لم تؤثر فى شخصيته، معللاً ذلك ب*سن تكوينه وسلامة أعضائه، ونجد أن "شبرنجر" يؤيدهما أيضاً ويتلمس مخرجاً لظهور هذه ال*الة عنده، فيعللها بأنها موروثة له عن أمه بسبب الرؤيا التى كانت تراه أثناء *مله… وما هى إلى من قبيل الخرافات() وهو يقصد أن أمه آمنة كانت مصابة بداء الصرع، يدلنا على وجوده عندها تلك الرؤيا المتكررة لها أثناء *ملها له، وليس لها نصيب من ال*ق، وقد ورث هذا الصرع منها0

أما "درمنغم" فإنه يعزو شر* الصدر إلى أمر معنوى يشير إلى مغزى فلسفى نبهت إليه سورة "الشر*" فيقول : "إنها نشأت من قول الله تعالى }ألم نشر* لك صدرك{() وأن هذه العملية أمر باطنى قام على تطهير ذلك القلب وتوسيعه ليتلقى رسالة الله عن *سن نية، ويبلغها بإخلاص تام، وي*تمل عبئها الثقيل، وأن أسطورة شق الصدر ذات مغزى فلسفى لما تشير إليه تلك الدرنة السوداء من الخطيئة الأولى التى لم يعف منها غير مريم وعيسى، ولما يدل عليه تطهير القلب من معنى الورع الصوفى"()0

وقد تأثر بهذا الفكر الاستشراقى أعداء السنة المطهرة والسيرة العطرة من القرآنيين، والرافضة0
يقول م*مود أبو ريه() مصر*اً بهذا التأثير قائلاً : "من شاء أن يستزيد من معرفة الإسرائيليات، والمسي*يات وغيرها فى الدين الإسلامى، فليرجع إلى كتب التفسير وال*ديث والتاريخ، وإلى كتب المستشرقين أمثال جلدتسيهر" وفون كريمر وغيرهما، فقد نقلت فيهما من هذه الإسرائيليات والمسي*يات أشياء كثيرة"()0

ويقول طاعناً فى *ديث شق الصدر قائلاً : "إن *ديث شق الصدر يأتى مؤيداً ل*ديث البخارى : "ما من بنى آدم مولود إلا يمسه الشيطان *ين يولد فيستهل صارخاً من مس الشيطان، غير مريم وابنها، ثم يقول أبو هريرة : واقرءوا إن شئتم }وإنى أعيذها بك وذريتها من الشيطان الرجيم{()0
ويقول : "وبذلك لم يسلم من طعن الشيطان أ*د غيرهما من بنى آدم أجمعين، *تى الرسل: نو* وإبراهيم وموسى وغيرهم، وخاتمهم م*مد صلى الله عليه وسلم فانظر واعجب! ولم يقفوا عند ذلك بل كان من رواياتهم أن النبى صلى الله عليه وسلم لم ينج من نخسة الشيطان إلا بعد أن نقذت الطعنة إلى قلبه، وكان ذلك بعملية جرا*ية تولتها الملائكة بآلات جرا*ية مصنوعة من الذهب! ونصت هذه الروايات أن صدره صلوات الله عليه قد شق وأخرجت منه العلقة السوداء! و*ظ الشيطان كما يقولون، وكأن هذه العملية لم تنج* فأعيد شق صدره… وإن هذه العملية الجرا*ية لتشبه من بعض الوجوه عملية صلب السيد المسي* عليه السلام، وإنما ذكروا ذلك لكى يغفر الله خطيئة آدم التى ا*تملها هو وذريته من بعده إلى يوم القيامة، وأصب*ت فى أعناقهم جميعاً، وتنص العقيدة المسي*ية أنه لا يظفر بهذا الغفران إلا من يؤمن بعقيدة الصلب0

ولئن قال المسلمون لإخوانهم المسي*يين : ولم لا يغفر الله لآدم خطيئته بغير هذه الوسيلة القاسية التى أزهقت فيها رو* طاهرة بريئة، هى رو* عيسى عليه السلام بغير ذنب؟ قيل لهم : ولم لم يخلق الله قلب رسوله الذى اصطفاه كما خلق قلوب إخوانه من الأنبياء والمرسلين – نقياً من العلقة السوداء، و*ظ الشيطان بغير هذه العملية الجرا*ية التى تمزق فيها صدره وقلبه مراراً عديدة!" () ومما يؤسف له تأثر بعض كتاب المسلمين بهذا الفكر الاستشراقى ومنهم الدكتور م*مد *سين هيكل() *يث يقول فى كتابه *ياة م*مد : "لا يطمئن المستشرقون، ولا يطمئن جماعة من المسلمين كذلك إلى قصة الملكين هذه، ويرونها ضعيفة السند، فالذى رأى الرجلين فى رواية كُتَّاب السيرة إنما هو طفل لا يزيد على سنتين إلا قليلاً، وكذلك كانت سن م*مد يومئذ"()0

ويجاب عن الشبهات السابقة بما يلى :
أولاً : رواية شق صدر رسول الله صلى الله عليه وسلم ثابتة ص*ي*ة رويت فى مصادر عدة بطرق ص*ي*ة لا يسع العقل المدرك إنكارها0
ثانياً : المستشرقون ومن تابعهم فى إنكارهم لشق الصدر لا يستندون إلى علم أو منطق سليم. وإليك التفصيل0
أما مستند إنكار "موير" و"نيكولسون" و"شبرنجر" فيكمن فى : أن ما *دث لرسول الله صلى الله عليه وسلم إنما كان ضرباً من نوبات الصرع التى كانت تتعاوده بين ال*ين وال*ين، وهو ما زعموه أيضاً فى *الات نزول الو*ى عليه() بهدف إنكار نبوته! لكن المتأمل فى معجزة شق الصدر يجد أن هناك بوناً شاسعاً بينه وبين الصرع، فإن نوبة الصرع لا تذر عند من تصيبه أى ذكر لما مر به أثناءها، بل هو ينسى هذه الفترة من *ياته بعد إفاقته من نوبته نسياناً تاماً، ولا يذكر شيئاً مما صنع أو *ل به خلالها، ذلك أن *ركة الشعور والتفكير تتعطل فيه تمام التعطيل0
هذه أعراض الصرع كما يثبتها العلم، ولم يكن ذلك ليصيب رسول الله صلى الله عليه وسلم ، بل كانت تنتبه *واسه المدركة فى تلك الأثناء تنبهاً لا عهد للناس به، وكان يذكر كل ما يطرأ عليه بدقة فائقة، بدليل قوله صلى الله عليه وسلم لما سئل عن كيفية إتيانه الو*ى قال : أ*ياناً يأتينى مثل صلصلة الجرس، وهو أشده على، فيفصم عنى، وقد وعيت عنه ما قال…"()0

هذا بالإضافة إلى أن قصة شق صدره الشريف ت*دث به الأطفال الذين كانوا فى ص*بته إبان *دوثها، ومن البعيد، بل ومن المست*يل أن يتفق الأطفال على اختراع *ادثة لا أساس لها، وذلك لطهرهم وصفاء سريرتهم ونقائها على أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ت*دث بها أيضاً بعد الرسالة على ما جاء فى رواية مسلم عن أنس بن مالك، وتصري*ه بأنه كان يرى أثر المخيط فى صدره صلى الله عليه وسلم !0

وكذلك جاء التصري* بقصة شق الصدر صري*اً على لسان رسول الله صلى الله عليه وسلم على ما جاء فى رواية عبد الله بن أ*مد عن أبى هريرة رضى الله عنه، وكذلك جاء التصري* بالشق ليلة الإسراء والمعراج على ما جاء فى الص*ي*ين عن أبى ذر رضى الله عنه0

أما ما زعمه "موير" من عدم تأثير النوبة فيه ل*سن تكوينه فإنه دس خبيث، وطعن مردود، مؤداه إنكار شق صدره لإنكار نبوته، متذرعاً بما هو مقرر عند المسلمين من كمال هيئته و*سن تكوينه صلى الله عليه وسلم ، وليس فى الروايات ما يساعد على زعمه وافتراءاته0

إذ كيف يجتمع *سن التكوين، و*دوث الصرع؟ إنها قضية من المض*كات المبكيات على عقله الكليل المتناقض!0

وأما ما زعمه "شبرنجر" من أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كانت له *الات عصبية تنتابه، وأنه ورثها عن أمه بسبب الرؤيا التى كانت تراها أثناء *مله، وما هى إلا من قبيل الخرافات! يكذبه ما سبق من أن أعراض الصرع ما كان ليصيب رسول الله صلى الله عليه وسلم منها شئ0

و*مله سبب الصرع، على رؤيا آمنة يكذبه أيضاً ما ثبت فى الص*ي* من تأكيده صلى الله عليه وسلم لرؤيا أمه، فى قوله صلى الله عليه وسلم : "إنى عبد الله وخاتم النبيين وأبى منجدل فى طينته، وسأخبركم عن ذلك، أنا دعوة أبى إبراهيم، وبشارة عيسى، ورؤيا أمى آمنة التى رأت، وكذلك أمهات المؤمنين يرين…"()0
وإذا كان "شبرنجر" يعتبر رؤيا أم رسول الله صلى الله عليه وسلم ، من قبيل الخرافات، فهل يعتبر أيضاً رؤيا أم موسى من قبيل الخرافات؟ والواردة فى قوله تعالى : }وأو*ينا إلى أم موسى أن أرضعيه فإذا خفت عليه فألقيه فى اليم ولا تخافى ولا ت*زنى إنا رادوه إليك وجاعلوه من المرسلين{()0

إن أم رسول الله صلى الله عليه وسلم آمنة، كان من أعقل الناس، وأص*هم بدناً، ومن زعم خلاف ذلك من المستشرقين فعليه الدليل، ولا دليل! لأن ال*ق المؤيد بالأدلة القاطعة. أن أم رسول الله صلى الله عليه وسلم كانت مؤمنة بعصمة ابنها (م*مد بن عبد الله صلى الله عليه وسلم ) من الشيطان، وأنه سيكون له شأن، وكان هذا بناءاً على أمارات ت*دثت بها ل*ليمة السعدية عندما تخوفت على رسول الله صلى الله عليه وسلم لما بلغها قصة شق صدره الشريف مع الغلمان0

قالت لها : "أفتخوفت عليه الشيطان؟ قالت *ليمة : قلت نعم، قالت آمنة : كلا! والله ما للشيطان عليه من سبيل() وإن لابنى شأناً! أفلا أخبرك خبره، قالت : قلت : بلى، قالت : رأيت *ين *ملت به أنه خرج منى نور أضاء لى به قصور بصرى من أرض الشام، ثم *ملت به، فوالله ما رأيت من *مل قط كان أخف، ولا أيسر منه، ووقع *ين ولدته، وإنه لواضع يديه بالأرض رافع رأسه إلى السماء، دعيه عنك، وانطلقى راشدة"()0

أما ما ادعاه "درمنغم" من أن قصة شق الصدر لا تستند إلا إلى الآية الكريمة وأنه عمل رو*ى خالص، فإن الدليل ليس هو الآية فقط، وإنما الدليل على وقوع شق الصدر على جهة ال*س، إنما هو الروايات المتواترة والمتكاثرة، التى ذخرت بها كتب السنة كما أسلفنا، و*سبك بمصدرها أ*د الص*ي*ين (مسلم) فلا سبيل إلى التشكيك فى وقوع القصة بعدها، وخاصة أنها جاءت مؤكدة ومفسرة للآية الكريمة }ألم نشر* لك صدرك{()0
وإن كانت دعوى المفكرين من المستشرقين، ومن لف لفهم من المسلمين، بأن *ياة الرسول صلى الله عليه وسلم *ياة إنسانية رفيعة، فلا معنى لمثل هذا ال*ادث بالنسبة له!! فإننا نقول لهم : إن ال*ياة الإنسانية الرفيعة لا تتعارض والمعجزات ال*سية للأنبياء عليهم الصلاة والسلام، ولماذا ينكر هذا على سيد ولد آدم، ولا ينكر على غيره ممن سبقه من الأنبياء ممن ظهرت على أيديهم خوارق العادات كموسى وعيسى عليهما السلام،ولم يقل أ*د من أهل العلم إن ذلك كان مجافياً ل*ياتهما الإنسانية الرفيعة؟0

وقصة شق الصدر لا تخالف العقل أيضاً من جهة كونها تمت دون إراقة دم، والتأمت دون آلات طبية، فإن العلم ال*ديث يؤيد ذلك ويصدقه، فقد اخترعت آلات للجرا*ة تجعل الجر* يلتئم بدون سيلان دم من جسم المريض، كما وجد بعض الأودية تمنع سيلان الدم بمجرد بثها على الجر*، والطبيب لا يدعى أنه يفعل الأشياء الخارقة، وإنما يعتقد أن ذلك قد تم بعلم مدروس له قواعده وأصوله. كيف وقد تم زرع بعض الأجسام المنقولة من ميت أو ص*ي* إلى آخر مريض، ويزاول *ياته الطبيعية بعد أن برأ وعافاه الله وزال عنه المرض؟ وإذا جاز ذلك فى *ق البشر وهو من جملة ما خلق الله عز وجل، أيستبعد ذلك على الخالق جل جلاله؟0

أما ما ادعاه الدكتور هيكل وغيره : بأن قصة شق الصدر ضعيفة السند، ولم يقم عليها دليل قطعى من الكتاب أو السنة() أو أن هذه القصة مأخوذة عن أهل الجاهلية، ومفتعلة ومختلقة()0
فهو نقد هزيل، لأنه نقد عام دون بيان الضعف من جهة السند، كيف وقد وردت قصة شق الصدر فى ص*ي* مسلم وغيره من كتب السنة كما بينا() *تى قال ال*افظ فى الفت* عن شق الصدر ليلة الإسراء إنه تواترت الروايات به()0
وهؤلاء الطاعنون بذلك أدخلوا أنفسهم فى ميدان هم ليسوا من فرسانه ف*الفهم الخطأ، وخالفهم الصواب، لأن رواية قصة شق الصدر – كما عرفت آنفاً – رواها أئمة ال*ديث، وجهابذته العارفون بكل دقائقه، وما يتصل به من تم*يص المرويات، ودراسة أ*وال رجالها، وما يتصل بذلك من قواعد علم الجر* والتعديل وغيرها. وأهل كل فن هم أعلم به من غيرهم! وقد ثبت ص*ة هذه القصة سنداً ومتناً، وأنها خالية من كل مطعن *سب قواعد علم ال*ديث وأصوله، مما يضطر العقل إلى قبولها والتسليم بها، وأ*اديث شق الصدر رواها الخلف عن السلف فى كل الطبقات منذ *دوثها إلى الآن، وهذا هو المعول عليه فى قبول ال*ديث أو رده() وليس اتباع الهوى والغرض دون دليل أو برهان، وإذا ثبت ذلك فاعلم أنه لا يشذ عن الإقرار ب*دوثها إلا كل مكابر يجافى ال*ق وأهله، وطرائق الب*ث الجاد المستقيم فى صادق الأخبار0

أما قول الدكتور هيكل : إن الذى رأى الرجلين فى رواية كتاب السيرة إنما هو طفل لا يزيد على سنتين إلا قليلاً، وكذلك كانت سن م*مد يومئذ0

فهو ادعاء ينقصه الدليل، والأرج* والأص* عند العلماء أنها كانت بعد إتمامه الأربع من السنين، وهو سن أجاز علماء ال*ديث فيه ص*ة ت*مل الطالب لل*ديث مادام مرتفعاً عن *ال من لا يعقل فهماً للخطاب، ورداً للجواب ون*و ذلك طبقاً لمعايير خاصة *ول الإدراك والتمييز والضبط تتفق مع ما هو ملا*ظ فى واقع الأطفال من النباهة، وقوة ال*افظة()0

وإذا كان مقبولاً ممن سوى المصطفى صلى الله عليه وسلم فى مثل سنه، وهم بلا ريب فى أدنى درجات التعقل بالنسبة له، أفلا يجوز ذلك لمن لو وزن بأمته كلها لرج*ها صلى الله عليه وسلم ؟0

و*تى لو كان سن رسول الله صلى الله عليه وسلم ومن معه من الغلمان ممن شهدوا قصة شق الصدر لا يزيد على سنتين إلا قليلاً كما يزعم الدكتور هيكل؛ أليس رسول الله صلى الله عليه وسلم صر* بالت*ديث بها بعد البعثة؟! أليس فى هذا التصري* بعد البعثة دليل على أن ذلك و*ى من الله عز وجل إليه بما *دث له فى صغره من عناية الله عز وجل به وعصمته؟!0

أليس فى الت*ديث بها بعد و*ى الله عز وجل إليه دليل على ص*ة القصة ووجوب قبولها، *تى ولو كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ومن شهدها فى الصغر دون سن التمييز؟!0

وأختم الرد على الدكتور هيكل ومن شايعه بما قاله فضيلة الشيخ م*مد عرجون : قال : "ولا عبرة بعدم اطمئنان المستشرقين، وجماعة "العقلانيين" من البا*ثين المعاصرين إلى القصة ووقوعها، فلو لم يكن فى رواياتها إلا رواية الشيخين البخارى ومسلم لكانت فى أعلى مرات الص*ة من نا*ية السند0

وأما غمز القصة بطفولية النبى صلى الله عليه وسلم ، واستعظام ما *دث به على سنه فى الرواية، فهذا من قبيل الإيهام المضلل، لأن ت*ديد السن لم تتفق عليه الروايات!0

على أننا نسأل عبيد الاستشراق والمستشرقين، ما قولكم فى رواية البخارى وهى صري*ة فى أن القصة وقعت بعد النبوة ليلة الإسراء؟ وال*ديث معكم فى وقوع القصة لا فى زمانها ومكانها، لأن ذلك ت*قيق تاريخى لا يضير الب*ث ألا تؤمنوا به، وكيف يستعظم ت*دثه صلى الله عليه وسلم على سنه، والأمر كله من قبيل الإعجاز؟ على أن ت*دثه كان وهو نبى رسول، إذ سئل من بعض أص*ابه فأجاب بما جاء فى الرواية0

والذى يعنى الب*ث أن قصة شق الصدر *ادث كونى، ومعجزة عجيبة وقعت لنبينا م*مد صلى الله عليه وسلم ، وجاءتنا بها الروايات الص*ي*ة الثابتة، ولا يردها تشكيك مستشرق، ولا مستغرب، ولا متعوقل ولا متعالم"()0
أما من *مل شر* الصدر على الأمور المعنوية من المستشرقين فظاهر من ج*دهم وإنكارهم، أما من *مله على ذلك من المسلمين، فإن صا*ب السيرة الهاشمية يقول رداً عليهم : "وما وقع من بعض جهلة العصر من إنكار ذلك و*مله على الأمر المعنوى، وإلزام قائله القول بقلب ال*قائق، فهو جهل صري*، وخطأ قبي*، نشأ من خذلان الله تعالى لهم وعكوفهم على العلوم الفلسفية، وبعدهم عن دقائق السنة"()0 أهـ.
ولا شك أن ذلك ينس*ب على كل منكر له فى القديم وال*ديث. عصمنا الله من ذلك.

أما مقارنة م*مود أبو ريه بين قصة شق الصدر، و*ديث نخس الشيطان كل مولود. فلا وجه لهذه المقارنة، لأن شق الصدر لم يكن لإزالة أثر النخسة كما زعم، وإنما كانت لتطهير القلب من شئ يخلق لكل إنسان بمقتضى أنه خلق ليبتلى0

أما تكراره فذلك كان لمقصود مناسب لوقت وقوعه، فالمقصود أولاً، غير المقصود ثانياً، وثالثاً، ورابعاً. على ن*و ما فصل سابقاً() وبالتالى لا وجه لسؤال أعداء السيرة العطرة، لماذا تكررت هذه العملية أربع أو خمس مرات فى أوقات متباعدة؟!!0

كما أنه لا وجه للمقارنة بين شق الصدر والصلب لما يلى :
أولاً : لأن شق الصدر أمر *ق وممكن، وثابت بالأسانيد الص*ي*ة المؤكدة للآية الكريمة }ألم نشر* لك صدرك{() والصلب أمر باطل، وفيه مخالفة للعقل والنقل، وقد نفاه القرآن نفياً باتاً، قال تعالى : }وقولهم إنا قتلنا المسي* عيسى ابن مريم رسول الله وما قتلوه وما صلبوه ولكن شبه لهم وإن الذين اختلفوا فيه لفى شك منه ما لهم به من علم إلا اتباع الظن وما قتلوه يقيناً بل رفعه الله إليه وكان الله عزيزاً *كيماً{()0
ثانياً : شق صدر رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يؤلمه البتة على ما زعمه أعداء السنة والسيرة() وإنما شق صدره الشريف على ما جاء فى ال*ديث : "أخذ كل وا*د من الملكين بعضده، ولا يجد صلى الله عليه وسلم لأ*دهما مساً، واضجعاه بلا قصر ولا *صر، وهوى أ*دهما إلى صدره الشريف ففلقها، ورسول الله صلى الله عليه وسلم لا يرى دماً، ولا وجعاً"() وهذا كله بخلاف الصلب!0
ثالثاً : شق صدره صلى الله عليه وسلم على ما جاء فى الروايات الص*ي*ة ليس لتكفير ذنبه ولا ذنب غيره، وهذا بخلاف خرافة صلب المسي*!0

أما قول م*مود أبو ريه تبعاً لأسياده من المبشرين والمستشرقين قال : "ولئن قال المسلمون… ولم لا يغفر الله لآدم خطيئته بغير هذه الوسيلة القاسية… قيل لهم : ولم لم يخلق الله قلب رسوله الذى اصطفاه كما خلق قلوب إخوانه المرسلين؟"0

قيل له : أما المسلمون فلا يقولون ما زعمت، وإنما يقولون : كيف يذنب آدم عليه السلام وهو عبد من عبيد الله، فيعاقب الله عيسى عليه السلام! وهو عند زاعمى ذلك "ابن الله الو*يد" بتلك العقوبة القاسية التى تألم لها عيسى بزعمهم أبلغ الألم، وصرخ بأعلى صوته "إيلى ايلى، لم شبقتنى" أى إلهى إلهى لم تركتنى؟ وقد قال الله عز وجل : }يا أيها الناس اتقوا ربكم واخشوا يوماً لا يجزى والد عن ولده ولا مولود هو جازٍ عن والده شيئاً إن وعد الله *ق{() وقال سب*انه : }ألا تزرُ وازرةٌ وزرَ أخرى{() وغير ذلك من الآيات التى تبطل الأساس الذى قامت عليه خرافة صلب المسي*!0

ثم أين العلم : أن قلوب سائر المرسلين لم تُخْلَق كما خُلِقَ قلب م*مد صلى الله عليه وسلم ؟ فقد تكون خلقت سواء، وخص سيدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بهذا التطهير، أو طهرت أيضاً بهذه الوسيلة أو غيرها، }والله يعلم وأنتم لا تعلمون{()0

أما ما ادعاه م*مود أبو ريه من أن بعض القساوسة المسي*يين : "اتكأوا على *ديث نخس الشيطان كل مولود *ين يولد، وقصة شق الصدر فى إثبات عقيدة من عقائدهم الزائفة، وهذا فى زعمه دليل على بطلان ال*ديث وقصة شق الصدر وردهما()0

فهذا ادعاء واتكاء باطل، والتبعة فى هذا الادعاء والاتكاء على من *رف ال*ديث عن موضعه، و*مله على غير م*امله الص*ي*ة0
فال*ديث ص*ي* رواية، ودراية، وليس فى معناه ما يدعو إلى رده عند الم*ققين، لأنه لا يخالف عقلاً ولا نقلاً. بل ال*ديث استجابة لدعاء أم السيدة مريم *يث قالت كما *كى القرآن عنها: }وإنى سميتها مريم وإنى أعيذها بك وذريتها من الشيطان الرجيم{() وبالتالى فال*ديث جاء تأكيداً وبياناً للآية الكريمة، كما جاء على لسان راوى ال*ديث أبو هريرة رضى الله عنه0
كما أن ال*ديث ليس كما توهم مخالفاً لقوله تعالى : }قل رب بما أغويتنى لأزينن لهم فى الأرض ولأغوينهم أجمعين. إلا عبادك منهم المخلصين. قال هذا صراط على مستقيم إن عبادى ليس لك عليهم سلطان إلا من اتبعك من الغاوين{()0

ولا مخالفاً أيضاً لما ثبت من عصمة الأنبياء عليهم الصلاة والسلام من الشيطان الرجيم لأن الذى يقتضيه ظاهر ال*ديث. أن إبليس – عليه لعنة الله – مُمَكَنْ من مس كل مولود عند ولادته، لكن عباد الله المخلصين لا يضرهم ذلك المس أصلاً، واستثنى من المخلصين مريم وابنها، فإنه ذهب يمس على عادته، ف*يل بينه وبين ذلك، فهذا وجه الاختصاص()، ولا يلزم منه تسلطه على غيرهما من المخلصين من أنبياء الله عليهم جميعاً الصلاة والسلام0

وليس فى إسناد خصوصية لعيسى عليه السلام، أو لغيره من الأنبياء، ما يعود بالنقص على إخوانه الأنبياء، ولا ما يثبت تفضيله عليهم، إذ من المسلم به أنه قد يكون فى المفضول من الخصائص ما ليس للأفضل، ولا يؤثر هذا فى أفضليته، لأن له من الخصائص ما يؤهله لاست*قاق الأفضلية()0

هذا ولا يلزم من وقوع المس إضلال الممسوس وإغواءه، فإن ذلك ظن فاسد، فكم تعرض الشيطان للأنبياء بأنواع الإفساد والإغواء، ومع ذلك عصمهم الله عز وجل، بعدم تمكنه من إغوائهم، أو إل*اق ضرر بهم يضر بالدين؛ وتأمل قوله تعالى فى *ق سيدنا أيوب عليه السلام : }واذكر عبدنا أيوب إذ نادى ربه أنى مسنى الشيطان بنصب وعذاب{() وقوله سب*انه فى *ق سيدنا آدم وزوجته : }فأزلهما الشيطان عنها فأخرجهما مما كانا فيه{() وقوله عز وجل فى *ق سيدنا موسى عليه السلام : }قال هذا من عمل الشيطان إنه عدو مضل مبين{() وقوله تعالى لسيدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم : }وإما ينزغنك من الشيطان نزغ فاستعذ بالله إنه سميع عليم{() وقوله صلى الله عليه وسلم : "إن عفريتاً() من الجن جعل يفتك() على البار*ة ليقطع على الصلاة. وإن الله أمكننى منه فذعته()… ال*ديث"()0

فكل هذا لا يتعارض مع *ديث (نخس الشيطان كل مولود) ولا مع قوله تعالى }إن عبادى ليس لك عليهم سلطان{ لأن معناه والله أعلم : "لن تسلط على إغوائهم الإغواء اللازم، لأن الكلام فيه لتقدم قوله : }لأغوينهم أجمعين{. وهذا لا ينافى أن يسلط على بعضهم لإغواء عارض، أو لإل*اق ضرر لا يضر بالدين()0
هذا ولا يلزم من ظاهر *ديث (نخس الشيطان كل مولود) أن تمتلئ الدنيا صراخاً وعياطاً كما توهم الزمخشرى() لأن ال*ديث إنما جعل ذلك عند الولادة ف*سب، وأما بعدها فلا! ولو *كمنا المشاهدة، فما من مولود إلا ويستهل صارخاً أو باكياً، وإنكار ذلك مكابرة()0

أما زعم م*مود أبو ريه : أن ذلك النخس أو المس لو وجد لبقى أثره، ولو بقى أثره لزم الصراخ والبكاء. فنقول : أرأيتم إذا ختن الطفل فتألم وبكى، أيستمر الألم والبكاء؟!!0

أما ما ذكره م*مود أبو ريه : عن الرازى وغيره() أن الخبر على خلاف الدليل لأن الشيطان إنما يدعو إلى الشر من يعرف الخيروالشر، والصبى ليس كذلك، كما أنه يلزم منه تمكن الشيطان من إهلاكهم… فأقول : ومن قال إن النخسة دعاء إلى الشر؟ بل إن كانت للإيلام فقط، فذلك من خبث الشيطان، مُكِّن منها، كما مُكِّن مما أصاب به سيدنا أيوب عليه السلام، وكما يمكن الكفار من قتل المسلمين *تى الأنبياء، وذب* أطفالهم. وإن كانت النخسة لإ*داث أمر من شأنه أن يورث القلب قبولاً ما للوسوسة بعد الكِبَرْ، فهذا لا يستدعى معرفة الخير والشر فى ال*ال. والتمكين من هذا كالتمكين من الوسوسة والتزيين، وذلك من تمام أصل البلاء. ولا يلزم من تمكنه من هذا النخس أن يفعل أكثر من ذلك من إهلاك الصال*ين، وإفساد أ*والهم كما زعم أعداء السنة والسيرة العطرة، لأنه لا يتمكن إلا إن مكنَّه الله تعالى، فإذا مكنَّه الله تعالى من أمر خاص، فمن أين يلزم تمكنه من غيره؟!!()0

ولعله بعد هذا العرض، ومناقشة المستشرقين وأضرابهم قد تبين لك الثقة الكاملة فى ثبوت الشق ال*سى لصدر رسول الله صلى الله عليه وسلم فى المرة الأولى مدعماً بالدليل الص*ي*، وأيضاً فيما تبعه من تكرره فى سن العاشرة وأشهر، وعند البعثة، وفى ليلة الإسراء والمعراج، مدعماً بالأدلة فى أص* كتب الص*ي* كما بينا فى موضعه مما سبق0

هذا وقد أنكر ص*ة وقوع شق الصدر ليلة الإسراء ابن *زم وعياض، وادعيا أنها تخليط من "شريك" وليس كذلك فقد ثبت هذا أيضاً فى الص*ي*ين من غير طريق "شريك"()0

قال ال*افظ ابن *جر : "جميع ما ورد من شق الصدر، واستخراج القلب، وغير ذلك من الأمور الخارقة للعادة مما ي*بب التسليم له، دون التعرض لصرفه عن *قيقته لصلا*ية القدرة، فـلا يست*يـل شئ من ذلك() ويؤيده ال*ديث الص*ي*. أنهـم كانوا يرون أثر المخيط فى صـدره صلى الله عليه وسلم "() أهـ.
والله تبارك وتعالى أعلى وأعلم

المطلب الثانى
شبهة الطاعنين فى *ديث "فترة الو*ى"
والرد عليها
روى البخارى ومسلم وغيرهما عن عائشة رضى الله عنها قالت : "أول ما بدئ به رسول الله صلى الله عليه وسلم من الو*ى الرؤيا الصال*ة فى النوم، فكان لا يرى رؤيا إلا جاءت مثل فلق الصب*. ثم *بب إليه الخلاء، وكان يخلو بغار *راء فيت*نث فيه – وهو التعبد – الليالى ذوات العدد، قبل أن ينزع إلى أهله ويتزود لذلك، ثم يرجع إلى خديجة() فيتزود لمثلها، *تى جاءه ال*ق، وهو فى غار *راء، فجاءه الملك،، فقال : اقرأ. قال : ما أنا بقارئ. قال : فأخذنى فغطنى() *تى بلغ منى الجهد، ثم أرسلنى فقال : اقرأ. قلت : ما أنا بقارئ. فأخذنى فغطنى الثانية *تى بلغ منى الجهد، ثم أرسلنى فقال : اقرأ. فقلت : ما أنا بقارئ فأخذنى فغطنى الثالثة، ثم أرسلنى فقال : }اقرأ باسم ربك الذى خلق خلق الإنسان من علق اقرأ وربك الأكرم{() فرجع بها رسول الله صلى الله عليه وسلم يرجف فؤاده، فدخل على خديجة بنت خويلد رضى الله عنها فقال : زملونى زملونى فزملوه() *تى ذهب عنه الروع، فقال لخديجة وأخبرها الخبر : لقد خشيت على نفسى. فقالت خديجة : كلا والله ما يخزيك الله أبداً، إنك لتصل الر*م، وت*مل الكل() وتكسب المعدوم() وتقرى الضيف، وتعين على نوائب() ال*ق، فانطلقت به خديجة *تى أتت به ورقة بن نوفل ابن أسد بن عبد العزى – ابن عم خديجة – وكان امرءاً تنصر فى الجاهلية، فيكتب بالعبرانية ما شاء الله أن يكتب، وكان شيخاً كبيراً قد عمى() فقالت له خديجة : يا ابن عم اسمع من ابن أخيك. فقال له ورقة : يا ابن أخى، ماذا ترى؟ فأخبره رسول الله صلى الله عليه وسلم خبر ما رأى. فقال له ورقة : هذا الناموس الذى نزل الله على موسى، يا ليتنى فيها جذعاً() ليتنى أكون *يا إذ يخرجك قومك رسول الله صلى الله عليه وسلم أو مخرجى هم؟ قال نعم، لم يأت رجل قط بمثل ما جئت به إلا عودى، وإن يدركنى يومك، أنصرك نصراً مؤزراً. ثم لم ينشب ورقة أن توفى، وفتر الو*ى"()0

وفى هذا ال*ديث الموصول زيادة فى آخره رواها الإمام عبد الرزاق عن معمر عن الزهرى بلاغاً قال : "وفتر الو*ى فترة *تى *زن النبى صلى الله عليه وسلم فيما بلغنا *زناً غدا منه مراراً، كى يتردى من رؤوس شواهق الجبال، فكلما أوفى بذروة جبل، لكى يلقى منه نفسه، تبدى له جبريل فقال : يا م*مد، إنك رسول الله *قاً، فيسكن لذلك جأشه، وتقر نفسه فيرجع، فإذا طالت عليه فترة الو*ى غدا لمثل ذلك، فإذا أوفى بذروة جبل تبدى له جبريل فقال له : مثل ذلك"()0
بهذه الرواية وزيادتها، طعن أعداء السنة والسيرة العطرة قديماً و*ديثاً فى الم*دثين زاعمين أن فى هذه الرواية طعن فى نبوة رسول الله صلى الله عليه وسلم وعصمته. فقديماً قالوا : "كيف يجوز للنبى أن يرتاب فى نبوته *تى يرجع إلى ورقة، ويشكوا لخديجة ما يخشاه، و*تى يوفى بذروة جبل ليلقى منها نفسه على ما جاء فى رواية معمر؟"()0

و*ديثاً : لم يخرج أعداء السنة والسيرة عن طعون أسلافهم قديماً. إذ يقول : عبد ال*سين شرف الدين الموسوى() "تراه – يعنى *ديث بدء الو*ى – نصاً فى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان – والعياذ بالله – مرتاباً فى نبوته بعد تمامها، وفى المَلَكْ بعد مجيئه إليه، وفى القرآن بعد نزوله عليه، وأنه كان من الخوف على نفسه فى *اجة إلى زوجته تشجعه، وإلى ورقة الأعمى الجاهلى…"()0
ويقول جعفر مرتضى العاملى() "كيف يجوز إرسال نبى يجهل نبوة نفسه، وي*تاج فى ت*قيقها إلى الاستعانة بامرأة، أو نصرانى؟ ألم تكن هى فضلاً عن ذلك النصرانى أجدر بمقام النبوة من ذلك الخائف المرعوب الشاك؟ ثم كيف يتناسب ذلك مع كونه أراد أن يلقى نفسه من شواهق الجبال"()0
ويجاب عن الشبهات السابقة بما يلى :
أولاً : ال*ديث الذى طعنوا فيه – بدون الزيادة – ص*ي* سنداً ومتناً، وفى أعلى درجات الص*ة، باتفاق البخارى ومسلم وغيرهما على إخراجه من رواية عائشة رضى الله عنها، ولا يقد* فى سند ال*ديث، وص*ة متنه، أن عائشة رضى الله عنها لم تدرك القصة، لما يلى :
أ- لأن مرسل الص*ابى *كمه على المذهب الص*ي*، الوصل المقتضى للا*تجاج به()0
ب- السيدة عائشة رضى الله عنها لم تنفرد برواية *ديث بدء الو*ى، فلل*ديث شاهد من *ديث جابر بن جابر عبد الله رضى الله عنه، وهو أيضاً لم يشهد هذه القصة، ولكنه فى روايته يصر* بالت*ديث عن بدء الو*ى وفترته سماعاً من رسول الله صلى الله عليه وسلم () مما يؤكد ص*ة مرسل عائشة، *يث لا يبعد سماعها تلك القصة من رسول الله صلى الله عليه وسلم أو ممن سمعها منه صلى الله عليه وسلم ، وهو ي*دث بها، كما سمعها جابر وصر* بذلك. ومما يؤكد ص*ة سماعها رضى الله عنها من رسول الله صلى الله عليه وسلم *ديث ب*ثنا، ما ورد فى ال*ديث من قوله (فغطنى *تى بلغ منى الجهد) فهنا فى الكلام التفات، *يث انتقل الكلام من *كاية عائشة، إلى *كاية رسول الله صلى الله عليه وسلم ، عن نفسه، مما يؤيد ص*ة إرسالها، وأنه موصول من أوله إلى آخره0

ثانياً : الزيادة الواردة فى سند *ديث عائشة رضى الله عنها غير ثابتة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، ولم يقل شيئاً منها، ولا فعلها، فهى لا تص* سنداً ولا متناً لما يلى :
أ- فأما الدليل على عدم ص*ة هذه الرواية سنداً فهو ما ورد فى الرواية ذاتها إذ فيها "*زن النبى صلى الله عليه وسلم ، فيما بلغنا…" والقائل "فيما بلغنا" هو الإمام الزهرى() وهو أعلم ال*فاظ، ولكن لا يقبل ما رواه من غير سند! فعن ي*يى بن سعيد القطان() قال : مرسل الزهرى شر من مرسل غيره، لأنه *افظ، وكلما قدر أن يسمى سمى! وإنما يترك من لا يستجيز أن يسميه() وهذه الزيادة من هذه القبيل، *يث أنها منقطعة قد رواها الزهرى بلاغاً، وهو من صغار التابعين، وجل روايته عن كبار التابعين، وأقلها عن صغار الص*ابة() فكيف بالكبار منهم، لاسيما من شهدوا بدء الو*ى إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم () وعلى ذلك فلا سند يعتمد عليه، ولعل الإمام البخارى وغيره ممن أخرج هذه الزيادة أرادوا بذلك التنبيه إلى مخالفتها لما ص* من *ديث بدء الو*ى الذى لم تذكر فيه هذه الزيادة، وخصوصاً أن البخارى لم يذكر هذه الزيادة فى بدء الو*ى، ولا التفسير، وإنما ذكرها فى التعبير على ما سبق فى التخريج0

ويؤيد ما سبق، أن الأئمة ال*فاظ يذكرون عقب هذه الزيادة *ديث جابر الص*ي* فى فترة الو*ى إلى الزهرى بنفس السند الذى يروونه عنه فى *ديث عائشة الأول، ويفهم من صنيعهم ذلك: أن الزهرى نفسه كان ي*دث ب*ديث جابر عقب *ديث عائشة0

ففى مصنف الإمام عبد الرزاق بعد فراغه من *ديث عائشة : قال معمر، قال الزهرى، فأخبرنى – *رف الفاء هذا يفيد العطف على رواية سابقة، والتعقيب بأخرى لا*قة، وذلك فى مجلس وا*د - أبو سلمة بن عبد الر*من عن جابر بن عبد الله قال : سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وهو ي*دث عن فترة الو*ى، فقال فى *ديثه : "بينما أنا أمشى سمعت صوتاً من السماء، فرفعت رأسى، فإذا الذى جاءنى ب*راء جالساً على كرسى بين السماء والأرض، فجُئِثْتُ() منه رعباً، ثم رجعت، فقلت : زملونى، زملونى، ودثرونى، فأنزل الله تعالى : }يا أيها المدثر{ إلى }والرجز فاهجر{()0

وكذلك الإمام البخارى ذكر *ديث عائشة المتقدم فى بدء الو*ى عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة رضى الله عنها إلى قولها : ثم لم ينشب ورقة أن توفى، وفتر الو*ى، ثم قال عقبة : قال ابن شهاب : وأخبرنى أبو سلمة بن عبد الر*من أن جابر بن عبد الله الأنصارى قال… فذكر ال*ديث بن*و رواية عبد الرزاق، غير أنه زاد فى آخره : "ف*مى الو*ى وتتابع"()0

قال ال*افظ ابن *جر : قوله : (قال ابن شهاب : وأخبرنى أبو سلمة) إنما أتى ب*رق العطف، ليعلم أنه معطوف على ما سبق، كأنه قال : أخبرنى عروة بكذا، وأخبرنى أبو سلمة بكذا، وأخطأ من زعم أن هذا معلق، وإن كانت صورته صورة التعليق، ولو لم يكن فى ذلك إلا ثبوت الواو العاطفة، فإنها دالة على تقديم شئ عطفته – وهو *ديث عائشة المتقدم – ثم قال ابن شهاب – أى بالسند المذكور – وأخبرنى أبو سلمة بخبر آخر، وهو *ديث جابر عن فترة الو*ى)()0

وكذلك فعل الإمام أ*مد فى مسنده، مع أنه قد جمع فى مسنده مرويات كل ص*ابى على *ده، دون الالتزام بالو*دة الموضوعية للأ*اديث، لكنه لما روى *ديث عائشة المتقدم عن عبد الرزاق عن معمر عن الزهرى، قال : فذكر *ديثاً() لعله يشير إلى *ديث جابر الذى أخرجه قبل ذلك فى المسند()0

وكذلك صنعا مسلم، وابن *بان فى ص*ي*يهما عقب إخراجهما ل*ديث عائشة رضى الله عنها() فدل هذا كله، على أن ابن شهاب الزهرى كان ي*دث بال*ديثين معاً، كما روى عنه غير وا*د مما سبق بيانه، وأن الصواب فى رواية *ديث عائشة بدون تلك الزيادة، كما أخرجه مسلم، والبخارى فى بعض مواضعه، وغيرهما()0
ب- أما الدليل على عدم ص*ة هذه الزيادة متناً فهو ما يلى :
معارضتها لأصل من أصول الإسلام، وهو عصمة الأنبياء والرسل عليهم الصلاة والسلام بمعنى : *فظ الله ظواهرهم وبواطنهم، وتفكيرهم وخواطرهم، وسائراً أعمالهم، *فظاً كاملاً، فلا يقع منهم قط ما يشكك فى نبوتهم ورسالاتهم، وهذا البلاغ المعمرى أو الزهرى، لم يبق لعصمة النبى صلى الله عليه وسلم مكاناً فى مدة ال*زن اليائس التى تقول أقصوصة هذا البلاغ إنه صلى الله عليه وسلم مكثها وهو يغدو مراراً كى يتردى من شواهق الجبال، ولاسيما على مذهب من يرى أن مدة فترة الو*ى – وهى مدة ال*زن اليائس – قد طالت إلى ثلاث سنوات، أو سنتين ونصف سنة، أو ستة أشهر، وفى هذا البلاغ الضعيف تصري* بأن صا*به يذهب مذهب من يرى طول مدة فترة الو*ى() لأن ما ذكر فيه من الغدو مراراً لكى يلقى بنفسه من ذرا الشواهق يقتضى طول المدة، ولاسيما مع تمثل جبريل له وقوله : أنا جبريل، وأنت رسول الله *قاً، أكثر من مرة0
يتعارض هذا البلاغ مع ما يجب أن يكون عليه النبى صلى الله عليه وسلم من رسوخ الإيمان بنبوته، وكمال اليقين برسالته، ولا شك أن ما جاء فى هذا البلاغ، من تبدى جبريل عليه السلام للنبى صلى الله عليه وسلم كلما أوفى بذروة جبل لكى يلقى منها نفسه، وقوله له : يا م*مد : أنت رسول الله *قاً، فإذا طالت عليه فترة الو*ى غدا لمثل ذلك، فإذا أوفى بذروة جبل تبدى له جبريل عليه السلام، فقال مثل ذلك – يصور مدى ما بلغه ذلك ال*زن اليائس – فى زعم قائليه – من نفس النبى صلى الله عليه وسلم *تى جعله يتشكك فى تبدى جبريل له، وفى إخباره أنه رسول الله *قاً، فالنبى صلى الله عليه وسلم - كما تصر* به عبارة هذا البلاغ – لم يكد يسكن جأشه لتبدى جبريل له وإخباره أنه رسول الله *قاً *تى يعود إلى عزيمته فى إلقاء نفسه من ذرا شواهق الجبال، فيتبدى له جبريل مرة أخرى، ويقول له : يا م*مد، أنت رسول الله *قاً0

فأين سكون جأشه الذى أ*دثه فى نفسه تبدى جبريل له، وإخباره أنه رسول الله *قاً؟0

وأين رسوخ إيمانه برسالة ربه التى شرفه بها قبل فترة الو*ى، وأنزل عليه فى أول مراتب و*يها فى غار *راء قرآناً يتلى، *تى يعود عن عزيمته لإلقاء نفسه من ذرا شواهق الجبال إذا طالت عليه فترة الو*ى؟!0
إن ما تضمنه هذا البلاغ الضعيف يشمل أمرين :
أ*دهما : ظاهر م*سوس، يمكن مشاهدته، وال*كم بوجوده أو عدم وجوده بمقتضى إمكان مشاهدته *ساً0
ثانيهما : باطن م*جوب فى داخل النفس، لا يمكن معرفته إلا بإخبار صا*به الذى دار فى نفسه، أو إخبار من أظهرهم عليه بنقل ثابت عنه. فذهاب النبى صلى الله عليه وسلم إلى أعالى الجبال وشواهقها التى ألف الصعود إليها فى أزمان خلواته وتطلعاته للتفكر فى عجائب آيات الله الكونية، وبدائع ملكوته، أمر م*سوس، يمكن ال*كم عليه برؤيته ومشاهدته، ولا *رج فى أن يكون النبى صلى الله عليه وسلم قد *زن فى فترة الو*ى اشتياقاً لأنوار الشهود الرو*انى الأعلى الذى كان يغمره فى أوقات نزول الو*ى، ونزول آيات القرآن المبين، *زناً كان يغدو منه إلى ذرا الجبال التى كانت مأنس رو*ه، تطلعاً إلى آفاق أشواقه لشهود تجليات أمين الو*ى جبريل عليه السلام الذى سبق له أن تجلى فى آفاقها بصورته الملائكية الرو*انية العالية0
وكون هذا الذهاب إلى ذرا شواهق الجبال لقصد التردى منها ليقتل نفسه – كما هو نص عبارة البلاغ الضعيف – أمر باطن م*جوب بأستار الضمير فى *نايا النفس، لا يعلمه، ولا يطلع عليه إلا الله علام الغيوب، وإلا صا*به الذى دار فى *نايا نفسه، وعزم على ت*قيقه عملياً، وإلا من يظهره عليه صا*به العليم به، بأخبار منه إليه، وكل ذلك لم يثبت!0
وما روى عن ابن عباس من قوله : "مكث النبى صلى الله عليه وسلم أياماً بعد مجئ الو*ى لا يرى جبريل، ف*زن *زناً شديداً *تى كان يغدو إلى ثبير() مرة، وإلى *راء أخرى، يريد أن يلقى نفسه"() غير مسلم من وجوه0
أ- أن *ديث ابن عباس من رواية الواقدى()، وهو معروف بالضعف، لا يقبل الجهابذة من الم*دثين روايته إلا إذا اعتضدت بروايات الثقات0
ب- إذا ص* سند ال*ديث إلى ابن عباس رضى الله عنهما، فهو اجتهاد لا يعلم معتمده، فى أمر لا سبيل إلى معرفته إلا بإخبار من النبى صلى الله عليه وسلم ، ولم يثبت هذا الإخبار، فال*ديث موقوف على ابن عباس، فيكون فى منزلة بلاغ الزهرى، كما يؤخذ من كلام ابن *جر() يجب رفضه كرفض بلاغ الزهرى، وإبطاله كإبطاله، ولعل هذا ال*ديث الضعيف فى سنده، الباطل فى متنه ونصه، هو مستند بلاغ الزهرى، والزهرى إمام موثق، فلا *رج على البخارى فى إل*اق بلاغة بجامعه من جهة توثيق السند، على أن البخارى لم يل*قه بجامعه إلا فى موضع وا*د فقط من مواضع *ديث بدء الو*ى، وهى متعددة فيه بالإسناد نفسه مقروناً بإسناد آخر تارة، وغير مقرون تارة أخرى، ولم يرد فى تلك المواضع ذكر لهذا البلاغ الضعيف إلا فى كتاب (التعبير) بلاغاً لا تأصيلاً0

ثالثاً : ثبت فى الص*ي* من *ديث جابر بن عبد الله رضى الله عنه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ت*دث عن فترة الو*ى، ولم يرد فى كلامه صلى الله عليه وسلم كلمة وا*دة، تشعر بما جاء فى هذا البلاغ الضعيف، *تى ولو مجرد *زن ل*ق به تأسفاً على هذه الفترة0

هذا مع أنه لا نرى *رجاً فى أن يكون النبى صلى الله عليه وسلم قد اعتراه شئ من ال*زن فى مدة فترة الو*ى، لانقطاع أنوار الشهود الرو*ى، ولا نرى *رجاً فى أن النبى صلى الله عليه وسلم كان يغدو إلى ذرا الجبال تطلعاً لتجليات أمين الو*ى الذى عهد لقاءه فى هذه الذرا، وهذا أمر فطرى وطبيعى، فالإنسان إذا *صل له خير أو نعمة فى مكان ما، فإنه ي*ب هذا المكان، ويلتمس فيه ما افتقده، فلما فتر الو*ى: صار صلى الله عليه وسلم يكثر من ارتياد قمم الجبال، ولاسيما *راء، رجاء أنه إن لم يجد جبريل فى *راء، فليجده فى غيره، فرآه راوى هذه الزيادة وهو يرتاد قمم الجبال، فظن أنه يريد أن يلقى بنفسه، وقد أخطأ الراوى المجهول فى ظنه قطعاً0

وليس أدل على ضعف هذه الزيادة وتهافتها من أن جبريل عليه السلام كان يقول للنبى صلى الله عليه وسلم كلما أوفى بذروة جبل : "يا م*مد إنك رسول الله *قاً" وأنه كرر ذلك مراراً، ولو ص* هذا لكانت مرة وا*دة تكفى فى تثبيت النبى صلى الله عليه وسلم وصرفه عما *دثته به نفسه كما زعموا()0
رابعاً : ما يشكل ظاهره فى ال*ديث الموصول – لعائشة رضى الله عنها – من ارتياب وشك من رسول الله صلى الله عليه وسلم فى نبوته – كما زعموا – مستشهدين على ذلك بقوله صلى الله عليه وسلم لخديجة "لقد خشيت على نفسى" وزعمهم شكواه صلى الله عليه وسلم لخديجة، ورجوعه إلى ورقة بن نوفل… هذا الإشكال لا وجه لهم فيه، كما أن هذه الكلمة : "لقد خشيت على نفسى" فى ذاتها لا تضير عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، ولا نبوته شيئاً0

والذين ذكروا هذه الكلمة فى رواياتهم قد أدوا أمانة العلم، ولا سبيل عليهم، إنما السبيل على الذين تق*موا متخرصين فى تفسير المراد من الخشية، *تى زعم بعضهم فى تفسيرها، وبيان المراد منها، بما كان ويكون أمضى سلا* فى يد أعداء الإسلام، وأعداء السنة المطهرة، والسيرة العطرة0
وما قيل فى تفسير الخشية من كلام لا يليق، ولا ينبغى أن يدون فى سيرة المعصوم صلى الله عليه وسلم قد أبطله بعض *ذاق الأئمة، و*ق له أن يبطل()0

أما ما زعمه أعداء السنة المطهرة من أن ظاهر هذه العبارة "لقد خشيت على نفسى يفيد ارتياب وشك رسول الله صلى الله عليه وسلم فى نبوته، فهذا من تخرصاتهم، ويرده سياق ال*ديث الذى وردت فيه هذه العبارة، وقبل بيان ذلك أقول : إن الله عز وجل إذا اصطفى أ*داً لنبوته أو رسالته يخلق فيه علماً ضرورياً بنبوته ب*يث لا يبقى له قلق ولا اضطراب، كما يظهر من قصة سيدنا موسى عليه السلام، *ين توجه إلى جبل الطور بسيناء ليأتى بقبساً أو يجد على النار هدى0

ومعلوم أنه لم يكن مراقباً عما يصنع به، ولا منتظراً بما يكلف به، إذ ناداه ربه عز وجل من شاطئ الوادى الأيمن : }إنى أنا ربك فاخلع نعليك إنك بالواد المقدس طوى{() وأمره أن يذهب إلى فرعون إنه طغى، فلما سمعه موسى عليه السلام، ألقى عليه فى ساعته تلك من اليقين، والإذعان بنبوته، ما هون عليه الدعوة لمثل فرعون الباغى الطاغى، ولم يشك فى نبوته كجنا* بعوضة، إلا أنه كان بشراً، خلق من ضعف، ولذا خاف من عصاه *ين صار جاناً – *ية عظيمة – لما أمره ربه عز وجل، بإلقاءها من يده، قال تعالى : }وما تلك بيمينك يا موسى. قال هى عصاى أتوكؤ عليها وأهش بها على غنمى ولى فيها مآرب أخرى.
قال ألقها يا موسى. فألقاها فإذا هى *ية تسعى. قال خذها ولا تخف سنعيدها سيرتها الأولى{()0

وقال سب*انه : }وألق عصاك فلما رآها تهتز كأنها جان ولى مدبراً ولم يعقب يا موسى لا تخف إنى لا يخاف لدى المرسلون. إلا من ظلم ثم بدل *سناً بعد سوء فإنى غفور ر*يم{()0

وبمقتضى بشريته أيضاً خاف من القتل، كما *كى القرآن الكريم على لسانه : }ولهم على ذنب فأخاف أن يقتلون{() ومن هنا شكى إلى ربه عن ضعفه، وسأله أن يجعل أخيه ردئاً يصدقه، ويكون عوناً له فإنه كان أفص* لساناً، قال تعالى : }قال رب إنى قتلت منهم نفساً فأخاف أن يقتلون. وأخى هارون هو أفص* منى لساناً فأرسله معى ردءاً يصدقنى إنى أخاف أن يكذبون{()0

ولم يكن هذا الخوف شكاً منه أو إعراضاً عما أمره الله عز وجل به – والعياذ بالله – بل إظهاراً لضعف جبل عليه الإنسان0

فإذا لم يشك من كان نبى بدون تمهيد، ولا سابقة خبر، فكيف بمن مهد له تمهيداً، ومرن تمريناً فى النوم واليقظة؟0

فالتمهيد كان منذ صغره وشبابه، من شق صدره، ونهيه عن التعرى، وعصمته من كل مظاهر الجاهلية التى سبق تفصيلها() والتمرين فى النوم بالرؤيا التى كان لا يراها إلا وتجئ مثل فلق الصب* الذى لا شك فيه، وفى اليقظة كان التمرين على الو*ى والنبوة بسلام ال*جر عليه، وسماع الصوت، ورؤية الضوء0

فعن جابر بن سمرة رضى الله عنه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال : "إنى لأعرف *جراً بمكة كان يسلم على، قبل أن أبعث، إنى لأعرفه الآن"()0

وجاء التصري* بصيغة التسليم برسول الله فى *ديث عائشة رضى الله عنها() و*ديث على بن أبى طالب رضى الله عنه إذ يقول : "كنت مع النبى صلى الله عليه وسلم بمكة فخرجنا فى بعض نوا*يها، فما استقبله جبل ولا شجر، إلا وهو يقول السلام عليك يا رسول الله"() وعنه صلى الله عليه وسلم قال : "يا خديجة إنى أسمع صوتاً، وأرى ضوءاً، وإنى أخشى أن يكون بى جنن، فقالت : لم يكن الله ليفعل بك ذلك يا عبد الله…"()0
وكل هذا التمهيد والتمرين على النبوة قبل التنبؤ يست*يل معه أن يشك رسول الله صلى الله عليه وسلم فى نبوته ورسالته بعد التنبؤ – *تى لو فتر الو*ى – وهنا نصل إلى تفسير الخشية0
تفسير الخشية فى قوله (لقد خشيت على نفسى) :
ورد فى سياق *ديث (بدء الو*ى) ما يعين على فهم ص*ي* ودقيق لقوله صلى الله عليه وسلم : "لقد خشيت على نفسى" ويرد تخرصات أعداء الإسلام، وأعداء السيرة العطرة، فى أن ظاهر هذه العبارة يفيد ارتياب وشك من رسول الله صلى الله عليه وسلم فى نبوته ورسالته0
1- وأول ما يعين على بيان *قيقة المراد من الخشية فى سياق ال*ديث قوله : "*تى فجئه ال*ق"() بكسر الجيم أى بغتة الأمر ال*ق، وهو الملك جبريل عليه السلام بالو*ى0

وهذه الجملة فى ال*ديث، تفيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم تعرض وهو فى غار *راء للمفاجأة، وت*ققت ثلاثة مرات متواليات :
الأولى : فى دخول الملك عليه صلى الله عليه وسلم مختلاه ومتعبده، دون تمهيد يشعر النبى صلى الله عليه وسلم بأن أ*داً سيدخل عليه فى الغار0
الثانية : فى رؤيته للملك جبريل عليه السلام على صورته الملائكية، وقد سد الأفق0
الثالثة : فى أمره بالقراءة عقب دخوله عليه مباشرة، وهو أمى لا يقرأ ولا يكتب!0

وفى كل ذلك نوع من المفاجأة الباغتة المؤثرة على الطبيعة البشرية بما يهز كيانها هزاً يق*م عليها الرعب والفزع0

ومن هنا كان خوف وفزع النبى صلى الله عليه وسلم خوفاً وفزعاً بشرياً رجف منه فؤاده، وسائر جسده، وظهرت على بشريته آثاره، *تى هدأت نفسه، فتلقى رسالة ربه متثبتاً، مغموراً بأنوار شهود العزة الإلهية فى يقين لا يداخله أدنى شك فى اصطفائه رسولاً بعد اجتبائه نبياً من الصال*ين0

2- وثانى ما يعين على تفسير الخشية قوله : "فغطى *تى بلغ منى الجهد" فهذه العبارة تبين مدى الشدائد التى ص*بت رسول الله صلى الله عليه وسلم فى هذا اللقاء المفاجئ0

إذ ص*ب مع دخول الملك عليه فى متعبده، دون تمهيد، ورؤيته للملك فى صورته الملائكية، وأمره بالقراءة، ص*ب كل ذلك مع ما فيه من شدة شدائد أخرى، إذ غطه الملك ثلاث مرات، والغط : العصر الشديد، و*بس النفس، وكأنه أراد ضمنى وعصرنى، أو أراد غمنى، ومنه الخنق، ويدل عليه رواية أبو داود الطيالسى "فأخذ ب*لقى"(). وفى كل مرة من هذا الغط بلغ من رسول الله صلى الله عليه وسلم "الجهد" مبلغه وغايته *تى ظن بنفسه الموت()0
3- وثالث ما يعين على فهم قوله "لقد خشيت على نفسى" نزول الو*ى عليه بأوائل سورة "العلق" و*الات النبى صلى الله عليه وسلم وقت نزول الو*ى عليه كلها شدة، فهى *الات خاصة تتغلب فيها رو*انيته على بشريته، ليتصف بصفة الملك، ليقع بينهما التناسب والتجانس، ويتم التلقى على أكمل وجه وأثبته0

يقول الإمام ابن *جر : "وهى *الة يؤخذ فيها النبى صلى الله عليه وسلم عن *ال الدنيا من غير موت، فهو مقام برزخى، ي*صل له عند تلقى الو*ى، ولما كان الرزخ العام ينكشف فيه للميت كثير من الأ*وال، خص الله عز وجل نبيه صلى الله عليه وسلم ببرزخ فى ال*ياة، يلقى إليه فيه و*يه المشتمل على كثير من الأسرار"()0

ويدل على شدة الو*ى أثناء نزوله على رسول الله صلى الله عليه وسلم أ*اديث كثيرة منها :
*ديث زيد بن ثابت رضى الله عنه قال : "كنت أكتب الو*ى لرسول الله صلى الله عليه وسلم وكان إذا نزل عليه أخذته بر*اء شديدة، وعرق عرقاً شديداً مثل الجمان ثم سرى عنه. وكنت أكتب وهو يملى على، فما أفرغ *تى تكاد رجلى تنكسر من ثقل الو*ى، *تى أقول : لا أمشى على رجلى أبداً"0
وعن عبد الله بن عمرو رضى الله عنهما قال : سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم ، هل ت*س بالو*ى؟ فقال: أسمع صلاصل ثم أسكت عند ذلك، فما من مرة يو*ى إلى إلا ظننت أن نفسى تقبض" وغير ذلك من الروايات السابق ذكرها() وهى روايات تبين لنا إلى أى مدى لاقى النبى صلى الله عليه وسلم من شدة أثناء تنزيل الو*ى عليه *تى أن الملامس لجسده الشريف، كان يشعر به كما مر من *ديث زيد بن ثابت رضى الله عنه، و*تى أنه صلى الله عليه وسلم يصر* بأنه ما من مرة يو*ى إليه إلا ظن أن نفسه تقبض!0

فإذا كانت الروايات السابقة تبين لنا *اله صلى الله عليه وسلم بعد مزاولات ومعاهدات بالو*ى، فما ظنك ب*اله إذا نزل عليه الو*ى لأول مرة، وهو غير ممارس لتلك الأهوال ولا *امل لهذه الأثقال؟!0

إن كل ما سبق من دخول الملك على رسول الله صلى الله عليه وسلم فى متعبده دون تمهيد، وتجلى الملك له، وقد سد الأفق، وغطه صلى الله عليه وسلم *تى بلغ منه الجهد، وأمره بالقراءة مع أميته، ونزل الو*ى عليه، وهو ما لو أنزل على الجبال لتصدعت من خشية الله0
كل ذلك جعله يرجف فؤاده، ويخشى على نفسه، لا لريب عرضه، أو هول هاله، بل لضعف فطر عليه الإنسان. نعم و*ق لرسول الله صلى الله عليه وسلم أن يرجف ويخشى، كيف وقد كان هذا أول معاملة اعترته! وفكر فى نفسك لو اعتراك ما اعتراه صلى الله عليه وسلم كيف يكون *الك؟!0
ومما يؤكد ما سبق من تفسير الخشية قوله صلى الله عليه وسلم : "بينما أنا أمشى، إذ سمعت صوتاً من السماء، فرفعت بصرى، فإذا الملك الذى جاءنى ب*راء جالس على كرسى بين السماء والأرض، فرعبت منه، فرجعت، فقلت : زملونى"() وهذا ال*ديث وإن كان فى واقعة أخرى، لكن ما جاء فيه من قوله : "فرعبت منه" قرينه قوية على أن خشيته صلى الله عليه وسلم على نفسه كانت مما رأى من المفاجآت السابق ذكرها، فضلاً عن شدة الو*ى التى اعترته لأول مرة، وهو فى غار *راء، وكلها أمور تضعف عن *ملها فطرة البشر. فالخوف والخشية، لا يصادم الإذعان والإتقان بشئ أصلاً، لأنه فى بنية البشر، قال تعالى : }يريد الله أن يخفف عنكم وخلق الإنسان ضعيفا{()0

وكما جاز لموسى عليه السلام أن يخاف من عصاه *ين صار ثعباناً، ولم يصادم ذلك إيمانه، جاز لرسول الله صلى الله عليه وسلم أيضاً أن يخشى عند رؤية الملك بهيئته الملائكية، وغطه، وشدة الو*ى، فكل ذلك ليس بأقل من عصا موسى عليه السلام()0
وكما هو معلوم فإن النبوة لا تمنع الأعراض البشرية التى لا تنافى العصمة، وسيدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ثبتت له النبوة قطعاً قبل مفاجأة الغار، وقبل فترة الو*ى()0
فإذا روى أنه فزع من هول المفاجأة، وما *ف بها، فلا يجوز قط أن يقال : إنه فزع فزعاً أذهله عن مقام نبوته فلم يتمكن من التأمل، وخشى على نفسه أن يكون كاهناً أو أن يكون به جنن0
كما لا يجوز قط أن يقال عنه : إنه *زن على فتور الو*ى *زناً أخرجه عن عصمة النبوة والرسالة، و*مله على م*اولة قتل نفسه0

ففترة الو*ى طالت أو قصرت() شأن من شئون الله تعالى التى ينفرد ب*كمتها فهى كانت لطفاً من الله تعالى لنبيه صلى الله عليه وسلم ور*مة به، ليستجم من عناء ما لاقى من روع المفاجأة، وشدة الغط، وشدة الو*ى، لاستفراغ بشريته ليزداد تشوفاً وتشوقاً إلى تتابع الو*ى، وتقوية لرو*انيته على ا*تمال ما يتوالى من الله عز وجل إليه، *تى يتم استعداده لتبليغ رسالته إلى الخلق كافة بصبر وقوة، ويقين لا يدانيه يقين فى أن الله عز وجل، سيتم عليه نعمته0

ويشهد لص*ة تفسير الخشية بما سبق ذكره، رجوعه صلى الله عليه وسلم إلى مكان ت*نثه فى غار *راء()، بعد ما لاقاه من الشدائد السابق ذكرها0
فهل فى منطق العقل أن يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم خشى على نفسه ما تخرص به المتخرصون، ثم يسرع إلى العودة إلى المكان الذى لقى فيه ما خشيه على نفسه فى زعم المتخرصين؟!0
إن بداهة العقل تأبى أن تقبل ذلك، وتنادى بأن أى إنسان توجس خفية من شر *ادث وقع له فى مكان لا يمكن أن يعود إليه، وفى سرعة، وهو يملك الاختيار والإرادة، وبالتالى فعودة رسول الله صلى الله عليه وسلم لنفس المكان الذى لقى فيه ما خشيه على نفسه، دليل قاطع على ثباته صلى الله عليه وسلم ، ورباطة جأشه، واطمئنانه ويقينه بفوزه برسالة ربه وأنه لم يشك قط ولو لل*ظة وا*دة فى نبوته، ولا فى أن ما جاءه هو جبريل عليه السلام، ومعه و*ى الله تعالى0
فكل ذلك يؤكد أن الخشية من الموت من شدة الرعب (من المفاجآت التى توالت عليه صلى الله عليه وسلم فى هذا اللقاء على ما سبق تفصيله) هو أدنى الأقوال بالصواب فى تفسير الخشية، وأسلمها من الارتياب كما قال ال*افظ ابن *جر() وهو ما أقول به وأرج*ه، بدليل سياق ال*ديث على ما سبق شر*ه، وبدليل قوله صلى الله عليه وسلم يعد تتابع نزول الو*ى عليه : "فما من مرة يو*ى إلى إلا ظننت أن نفسى تقبض"() فهو نص صري* فى خشيته على نفسه من الموت، من شدة الو*ى، وهو أ*د المفاجآت التى توالت عليه فى هذا اللقاء0

كما لا يمنع أن تكون خشيته صلى الله عليه وسلم على نفسه من الموت على أيدى كفار قريش، إذا بلغهم رسالة ربه عز وجل، ويشهد لص*ة هذا قوله صلى الله عليه وسلم : "…وإن الله أمرنى أن أ*رق قريشاً. فقلت رب! إذا يثلغوا رأسى فيدعوه خبزه. قال : استخرجهم كما استخرجوك"()0

إن خوف رسول الله صلى الله عليه وسلم على نفسه من الموت من شدة الرعب، وشدة نزول الو*ى عليه، ومن أن يقتله قومه، جعله يرجع بما *ملت نفسه الكريمة من آثار ذلك كله، إلى بيته، وزوجته الأمينة، وزيرة الصدق، ومأنس الوفاء، يبدى لها ما تعرض له فى غار *راء، من م*ن وشدائد تذيب رواسى الجبال، فكان من فراستها ورجا*ة عقلها، أن أقسمت على أن الله تعالى لن يخزيه، وأكدت ذلك بلفظ التأبيد (كلا والله ما يخزيك الله أبداً) واستدلت على ما أقسمت عليه بأمر استقرائى، فوصفته بأصول مكارم الأخلاق (إنك لتصل الر*م، وت*مل الكل، وتكسب المعدوم، وتقرى الضيف، وتعين على نوائب ال*ق)0

خامساً : بقى الجواب عن ما يزعمه أعداء السنة المطهرة من استنكار لتخفيف الزوجة على زوجها، إذا ألمت به م*نة وشدة، وكذلك استنكار لطلب عين اليقين0

إذ زعموا أن فى إخبار رسول الله صلى الله عليه وسلم لزوجته ما *دث له، ثم ذهابهم إلى ورقة بن نوفل، منقصة لرسول الله صلى الله عليه وسلم ، ودليل فى زعمهم على ارتيابه فى نبوته، ومنقبة لزوجته خديجة وورقة وأنهما أ*ق بالنبوة منه() وهذا لعمرى لمنطق معكوس إذ كيف ينكر عاقل دور الزوجة عامة فى تخفيف الآلام عن زوجها، وخاصة دور خديجة العظيم فى تخفيف آلام رسول الله صلى الله عليه وسلم منذ أول يوم أرسل إليه فيه، *تى تتابعت على رسول الله صلى الله عليه وسلم المصائب بموتها وموت عمه أبو طالب، ونالت قريش من أذيته صلى الله عليه وسلم ما لم تكن تطمع به فى *ياتهما() وما ذلك إلا لأن مواقفها من رسول الله صلى الله عليه وسلم ، من أشرف المواقف التى ت*مد لامرأة فى الأولين والآخرين0

ويدل على ذلك ما روى عن عائشة رضى الله عنها قالت : "كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يكاد يخرج من البيت *تى يذكر خديجة، في*سن الثناء عليها، فذكرها يوماً من الأيام، فأدركتنى الغيرة، فقلت : هل كانت إلا عجوزاً، فقد أبدلك الله خيرا منها، فغضب، *تى اهتز مقدم شعره من الغضب، ثم قال : "لا والله ما أبدلنى الله خيراً منها، آمنت بى إذ كفر الناس، وصدقتنى إذ كذبنى الناس، وواستنى بمالها إذ *رمنى الناس، ورزقنى الله منها أولاداً إذ *رمنى أولاد النساء" قالت عائشة : فقلت فى نفسى، لا أذكرها بسيئة أبداً"()0
وأصل ال*ديث فى الص*ي*ين عن عائشة رضى الله عنها قالت : "ما غرت على أ*د من نساء النبى صلى الله عليه وسلم ما غرت على خديجة، وما رأيتها، ولكن كان النبى صلى الله عليه وسلم يكثر ذكرها، وربما ذب* الشاة، ثم يقطعها أعضاء، ثم يبعثها فى صدائق خديجة، فربما قلت له : كأنه لم يكن فى الدنيا امرأة إلا خديجة؟! فيقول : "إنها كانت وكانت، وكان لى منها ولد" وفى رواية مسلم : "إنى قد رزقت *بها"()0
فتأمل قوله صلى الله عليه وسلم : "لا والله ما أبدلنى الله خيراً منها، آمنت بى إذ كفر الناس.. إلخ إنها كلمات من جوامع الكلم تبين عظيم دورها فى تخفيف آلام الدعوة وشدائدها عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، كما أن فى ال*ديث بيان لعظم فضلها، وإلى أى مدى عرف لها النبى صلى الله عليه وسلم قدرها ومنزلتها فى *ياتها، و*فظ لها ودها وعهدها بعد وفاتها، فرضى الله عنها وأرضاها، وجزاها بفضله وكرمه عن دينه ونبيه، خير وأوفر الجزاء0
وإذا كان دورها فى الدعوة الإسلامية لا ينكره عاقل، فلا وجه لاستنكار أعداء السنة المطهرة، تخفيفها عن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد عودته من غار *راء ولاسيما ورسول الله صلى الله عليه وسلم ، عاد إليها وعليه آثار الروع والمشقة، رأتها على وجهه وجسده الشريف، كما كان يراها فيما بعد ص*ابة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، على ما ورد فى *الات نزول الو*ى عليه0

وليس فى روايات ال*ديث ما ي*اول زعمه أعداء السنة والسيرة العطرة، من أن رسول الله صلى الله عليه وسلم اشتكى لخديجة (شكوى من يرتاب فى نبوته ورسالته والعياذ بالله)0

وإنما إذا ص* التعبير أن يكون من رسول الله صلى الله عليه وسلم شكوى، فهى شكوى من زوج لزوجته، يريد أن يخفف عنه ما لاقاه من رعب وفزع وشدة فى هذا اللقاء الذى عاد منه إلى بيته، ولا تزال آثاره على سائر جسده الذى يرجف مما جعله يقول : "زملونى، زملونى" أو "دثرونى، دثرونى" والمعنى وا*د، وكأنه صلى الله عليه وسلم يقول : غطونى بما أدفأ به *تى يذهب عنى أثر الرعب والرجفة عن سائر جسدى() تقول أم المؤمنين عائشة رضى الله عنها "فزملوه *تى ذهب عنه الروع" وهو بفت* الراء أى الفزع، وأما الذى بضم الراء فهو موضع الفزع من القلب()0
وتأمل ما جاء فى ال*ديث من قوله صلى الله عليه وسلم : "يا خديجة مالى؟" وهو استفهام تعجبى، أى : أى شئ ثبت لى، *تى *صل ما *صل، وأخبرها الخبر، وما عانى فيه، *تى ظن أن نفسه تقبض من شدة الفزع والرعب، من هول المفاجأة، ومن معاناة نزول الو*ى عليه، وهو ما عبر عنه بقوله : "لقد خشيت على نفسى"0

فأين الشكوى التى يزعمها أعداء السيرة العطرة؟ وإذا كانت شكوى فأين ما فيها مما يفيد فى زعمهم أنه شك وارتاب فى نبوته؟ إنه مجرد "إخبار من زوج لزوجته لموقف شديد *دث له يريد أن تخفف عنه آثاره! فأى استنكار فى ذلك؟!0
وقد أدت الزوجة خديجة رضى الله عنها دورها باطمئنان زوجها والتخفيف عنه بأعظم الكلمات على ما سبق شر*ه قريباً0

وأرادت أن تزداد يقيناً فانطلقت به إلى ورقة بن نوفل ابن عمها وكان امرءاً تنصر فى الجاهلية، واشتهر عنه فى مكة من العلم بما فى التوراة والإنجيل، وتباشير الأ*بار والرهبان، بما جاء فى الكتابين من أوصاف نبى آخر الزمان، وأن وقته قد أظل، فلما أخبره صلى الله عليه وسلم بما رأى، قال ورقة (هذا الناموس الذى أنزل على موسى) وتمنى ورقة أن يعيش *تى يدرك انتشار الإسلام، ليكون جندياً من جنود الله، يجاهد فى ظل لواء النبى صلى الله عليه وسلم فى سبيل إعلاء كلمة الله ولكنه أدركته منيته، فلم يلبث بعد بعث النبى صلى الله عليه وسلم إلا قليلاً، ثم توفى، وفتر الو*ى، هذا كل ما تفيده قصة ذهابه صلى الله عليه وسلم وزوجته إلى ورقة بن نوفل0
فهل فيها ما يزعمه الخصوم من ارتياب رسول الله صلى الله عليه وسلم فى نبوته؟!0

وأنى لهم هذا الزعم، وكل ما فى ال*ديث أن ورقة، سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم ، عما رأى قائلاً: "يا ابن أخى ماذا ترى؟" فأخبره صلى الله عليه وسلم خبر ما رأى" إذن لم يسأله ورقة عما يشك فيه؛ ولم يقل له رسول الله صلى الله عليه وسلم إنى أشك فى كذا، وإنما كل ما فى الأمر، سؤال عما *دث له، وإخبار منه صلى الله عليه وسلم لهذا ال*دث0

وما كان من جواب ورقة لرسول الله صلى الله عليه وسلم إلا بيان بأن ما رآه هو أمين و*ى الله تعالى الذى أنزل على موسى عليه السلام، وهنا ازداد رسول الله صلى الله عليه وسلم نوراً إلى نور يقينه، لما يعلمه من مكانه ورقة فى العلم والمعرفة بما فى التوراة والإنجيل من المبشرات ببعث رسول الله قد أظل ال*ياة مخرجه0
فهل فى طلب عين اليقين استنكار؟! لاسيما وأن النبوة، من المغيبات تبقى فيها أمور تتردد النفس فى تفاصيلها، ولا يكون هذا التردد فى المتعلقات التى لا تدخل فى الإيمان، ألا ترى إلى قوله تعالى فى سؤال إبراهيم عليه السلام عن كيفية إ*يائه عز وجل للموتى }أو لم تؤمن قال بلى ولكن ليطمئن قلبى{() أى الإيمان *اصل بالمرة، ولكن إ*يائك غيب، فأريد أن أرى الغائب شاهداً لأزيل به ما يبقى فى الغيب، وسماه طمأنينة، وبالتالى سؤاله عليه السلام لم يخالف إيمانه، بل أكده0

وكذلك ال*ال مع ذهاب رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى ورقة، كل ما فيه طلب عين اليقين؛ ولا يعنى ذهابه أنه شك فى نبوته عما يزعم الرافضة، بدليل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يعقب على كلام ورقة إلا بقوله : "أو مخرجى هم؟" ولم يعقب صلى الله عليه وسلم على قوله "هذا الناموس الذى أنزل على موسى" لأنه صلى الله عليه وسلم كان على يقين بأنه مَلَك من عند ربه عز وجل، نزل عليه بو*ى الله تعالى، فلم يزده صلى الله عليه وسلم هذا الجواب إلا يقيناً على يقينه، وإلا لو كان فى شك – لجاء – ما يشير إلى ذلك، تعقيباً واستفسار منه صلى الله عليه وسلم لورقة، وإنما لم يعقب ولم يستفسر صلى الله عليه وسلم عن ذلك ليقينه بذلك، وإنما جاء التعقيب والاستفسار على قول ورقة "ليتنى أكون *ياً إذ يخرجك قومك" ففى هذا الكلام شئ جديد على رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فيستفسر "أو مخرجى هم" وكأنه عليه الصلاة والسلام يقول : كيف يخرجونى، وأنا جئت لإخراجهم من الظلمات إلى النور، وكيف يخرجونى من *رم الله، وجوار بيته، وبلدة آبائى من عهد إسماعيل عليه السلام؟0
فيأتى الجواب من ورقة : نعم! أى هم مخرجوك، لم يأت رجل قط بمثل ما جئت به إلا عودى، وإن يدركنى يومك أنصرك نصراً مؤزراً0

ولعل *كمة المولى عز وجل اقتضت أن تكون ما أخذت رسول الله صلى الله عليه وسلم من المخافة، وما غشيته من الخشية والرهبة كلها ألقيت عليه تكويناً، ليرجع إلى من جعلها الله عز وجل سكناً، وترجع به إلى ورقة، فيشيع خبر نبوته من قبلهم… ويصير بهذا الطريق دليلاً م*كماً على أن م*مداً صلى الله عليه وسلم نبى صادق، *تى شهد به شاهد من أهله، (خديجة) وشهد به ورقة الذى كان يعرف *ال الأنبياء، ليكون *جة على أهل الكتاب، وعلى المشركين الذين يقدرون علم ومكانه ورقة بالمبشرات0
وهكذا يقدر المولى عز وجل لأنبيائه ورسله أموراً، ويلقيها عليهم تكويناً لمصال* لا يعلمها إلا هو() أهـ0
والله تبارك وتعالى أعلى وأعلم

المطلب الثالث
شبهة الطاعنين فى *ديث "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم"
والرد عليها

روى البخارى ومسلم من *ديث أبى هريرة رضى الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم إذ قال : }رب أرنى كيف ت*ى الموتى قال أولم تؤمن قال بلى ولكن ليطمئن قلبى{()0

هذا ال*ديث طعن فيه أعداء السنة والسيرة قديماً من أهل الأهواء والبدع، وزعموا أن فيه طعناً فى عصمة الأنبياء عليهم الصلاة والسلام() وتابعهم *ديثاً أذيالهم إذا يقول عبد ال*سين شرف الدين الموسوى : "إن الظاهر من قوله : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" ثبوت الشك لرسول الله صلى الله عليه وسلم ، ولسائر الأنبياء، وأنهم جميعاً أولى به من إبراهيم، ولو فرض عدم إرادة الأنبياء جميعاً فإرادة رسول الله صلى الله عليه وسلم مما لابد منها…، وال*ديث نص صري* فى أنه أولى بالشك"()0

ويجاب عن ما سبق بما يلى :
أولاً : إجماع الأمة على عصمة أنبياء الله عز وجل ورسله، من الكفر والشرك، والشك، ومن تسلط الشيطان عليهم، وأن تلك العصمة صفة أساسية فيهم، وشرطاً ضرورياً من شروط الرسالة، كما أنها جزء من الكمال البشرى الذى كملهم الله عز وجل به، *تى يبلغوا رسالة ربهم إلى أقوامهم، وقد سبق تفصيل ذلك فى *قه صلى الله عليه وسلم من خلال القرآن والسنة()0
ثانياً : اتفاق علماء المسلمين على أن ظاهر الشك فى قوله صلى الله عليه وسلم : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" ليس مراداً، كما أنه ليس فى ظاهر هذا القول اعتراف بالشك، بل نفيه عن نفسه صلى الله عليه وسلم ، وعن إبراهيم وسائر أنبياء الله ورسله عليهم الصلاة والسلام، إذ ما يجوز فى *ق وا*د منهم يجور فى *ق الجميع0

يقول ال*افظ ابن كثير : قوله صلى الله عليه وسلم : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" ليس المراد هاهنا بالشك ما قد يفهمه من لا علم عنده، بلا خلاف()0
وقال الإمام على القارى() : "ليس فى قوله صلى الله عليه وسلم : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" اعترافاً منه بالشك لهما، بل نفى لأن يكون إبراهيم عليه السلام شك"()0

ثالثاً : إن سبب قوله صلى الله عليه وسلم "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" على ما جاء فى ال*ديث ما ذكره صلى الله عليه وسلم من قوله تعالى على لسان سيدنا إبراهيم عليه السلام : }رب أرنى كيف ت*ى الموت قال أولم تؤمن قال بلى ولكن ليطمئن قلبى{() وهذه الآية وما بعدها قد يسبق إلى بعض الأذهان الفاسدة منها ا*تمال الشك، فأراد صلى الله عليه وسلم نفى هذا الشك عن سيدنا إبراهيم، وإبعاد للخواطر الضعيفة أن تظن هذا به عليه السلام0

ويؤكد ذلك أنه ليس فى سؤال سيدنا إبراهيم عليه السلام ما يدل على أنه شك، إذ السؤال وقع بـ "كيف" الدالة على *ال شئ موجود مقرر عند السائل والمسئول، كما تقول : كيف علم فلان؟ فكيف فى الآية، سؤال عن هيئة الإ*ياء، لا عن نفس الإ*ياء، فإنه ثابت مقرر لدى سيدنا إبراهيم عليه السلام() وهو ما شهد به رب العزة لسيدنا إبراهيم رداً على سؤاله، بقوله عز وجل: "أولم تؤمن" والاستفهام هنا تقريرى للمنفى، وهو الشك، كأنه قال له : ألست مؤمناً بالبعث؟ فكان جوابه عليه السلام بـ "بلى" لإثبات المنفى وهو الشك، والمعنى : أنا مؤمن بالبعث كما علمت ما فى قلبى، لكننى أريد أن يطمئن قلبى برؤية الكيفية فقط، واعتبر بذلك0
فما شك إبراهيم عليه السلام، ولم يكن لديه أى شبهة فى قدرة الله تعالى على إ*ياء الموتى، إذ لم يقل لله تعالى : أتستطيع أن ت*ى الموتى؟ وإنما أراد أن يرى الهيئة، كما أننا لا نشك فى وجود الفيل، والتمسا*، والكسوف، وزيادة النهر، ورسول الله صلى الله عليه وسلم ، ثم يرغب من لم يرى ذلك منا، فى أن يرى كل ذلك، ولا يشك فى أنه *ق، لكن ليرى العجب الذى يتمثله فى نفسه، ولم تقع عليه *اسة بصره قط()0

فواض* فى السؤال والجواب، أنه عليه السلام، لم يسأل لشك أو شبهة أو تردد وهذا ظاهر من سؤاله، إذ لم يقل لله تعالى : "هل تقدر أن ت*ى الموتى، أم لا تقدر؟0

وهذا يشبه قولك لرسام كبير : دعنى أنظر إليك وأنت ترسم لو*ة، أو لخطاط فنان : خط أمامى لكى أرى كيف تخط مثل هذه الخطوط الجميلة0

فليس فى مثل هذا الطلب أى نا*ية تعجيزية، بل هو تعبير عن الافتنان بفنه الجميل، واعتراف به، ولهفة على رؤية دقائق فنه، وسعادة كبيرة فى تأمل كيفية ظهور لو*ة رائعة، مر*لة مر*لة. أجل : فالسؤال كان *ول كيفية الإ*ياء، وليس *ول إمكانيته أو عدم إمكانيته"()0
قلت : وكيف يشك من وصفه ربه عز وجل فى كتابه بقوله تعالى : }ولقد آتينا إبراهيم رشده من قبل وكنا به عالمين{() وقوله سب*انه : }وكذلك نرى إبراهيم ملكوت السماوات والأرض وليكون من الموقنين{() والرشد، والإيقان، اسمى مراتب العلم الذى لا يص* معه شك أو *تى شبهة!0
وكيف يص* الشك، وقد وصفه ربه تعالى بقوله : }وإن من شيعته لإبراهيم إذ جاء ربه بقلب سليم{() فبين رب العزة كما ترى أنه جاء ربه بقلب سليم، وإنما أراد به، أنه كان سليماً من الشك، وخالصاً للمعرفة واليقين، ثم ذكر المولى عز وجل، أنه عاب قومه على عبادة الأصنام فقال تعالى : }ماذا تعبدون. أإفكاً آلهة دون الله تريدون{() فسمى عبادتهم بأنها إفك وباطل، ثم قال سب*انه : }فما ظنكم برب العالمين{() وهذا قول عارف بالله تعالى غير شاك!0
فكيف يكون قوله }رب أرنى كيف ت*ى الموتى{() شك فى البعث وإ*ياء الموتى؟!0
ال*ديث *جة لنا لا علينا :
ومن هنا كان قوله صلى الله عليه وسلم : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" *جة لنا إذ فيه نفى للشك عن سيدنا إبراهيم عليه السلام، وعن نفسه صلى الله عليه وسلم ، وهذا من أ*سن الأقوال وأص*ها وأرج*ها عندى فى معنى قوله صلى الله عليه وسلم ، "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" فكأنه صلى الله عليه وسلم يقول : إن الشك مست*يل فى *ق إبراهيم عليه السلام، فإن الشك فى إ*ياء الموتى لو كان متطرقاً إلى الأنبياء، لكنت أنا أ*ق به من إبراهيم، لأن ما يجوز فى *ق وا*د من الأنبياء يجوز فى *قهم جميعهم، وقد علمتم أنى لم أشك، فاعلموا أن إبراهيم عليه السلام لم يشك!0
أو أراد صلى الله عليه وسلم بقوله : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" أن يقول : إن هذا الذى تظنونه شكاً، أنا أولى به، ولكنه ليس بشك، وإنما هو طلب لمزيد اليقين0
وهذا الكلام مما جرت به العادة فى المخاطبة، لمن أراد أن يدفع عن آخر شيئاً، قال : مهما أردت أن تقوله لفلان فقله لى، ومقصوده صلى الله عليه وسلم لا تقل ذلك0
وإنما خص إبراهيم عليه السلام، لكون الآية قد يسبق إلى بعض الأذهان الفاسدة، منها ا*تمال الشك، وإنما رج* إبراهيم عليه السلام على نفسه صلى الله عليه وسلم ، تواضعاً وأدباً، أو قبل أن يعلم صلى الله عليه وسلم أنه خير وسيد ولد آدم عليه السلام()0
هذا : وقيل غير ذلك من الأقوال فى توجيه قوله صلى الله عليه وسلم : "ن*ن أ*ق بالشك من إبراهيم" لكنها أقوال ضعيفة() ومن هنا اقتصرت على ذكر ما سبق منها، لكونها أص*ها، وأوض*ها، وأرج*ها أهـ.
والله تعالى أعلى وأعلم
المطلب الرابع
شبهة الطاعنين فى *ديث "س*ر رسول الله صلى الله عليه وسلم " والرد عليها
روى البخارى ومسلم : عن عائشة رضى الله عنها قالت : "س*ر رسول الله صلى الله عليه وسلم يهودى من يهود بنى زُريق، يقال له : لبيد بن الأعصم() قالت : *تى كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ، يخيل إليه أنه يفعل الشئ وما يفعله، *تى إذا كان ذات يوم، أو ذات ليلة، دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم ، ثم دعا. ثم دعا. ثم قال : يا عائشة! أَشَعَرْتِ أن الله أفتانى فيما استفتيته فيه؟ جاءنى رجلان() فقعد أ*دهما عند رأسى، والآخر عند رجلى، فقال الذى عند رأسى، للذى عند رجلى، أو الذى عند رجلى، للذى عند رأسى : ما وجع الرجل؟ قال : مطبوب() قال : من طبه؟ قال : لبيد بن الأعصم قال فى أى شئ؟ قال فى مشط() ومشاطة() قال : وجب() طلعة ذكر، قال : فأين هو؟ قال : فى بئر ذى أروان() قالت : فأتاها رسول الله صلى الله عليه وسلم فى أناس من أص*ابه، ثم قال : يا عائشة! والله! لكأن ماءها نقاعة ال*ناء، ولكأن نخلها رءوس الشياطين، قالت : فقلت : يا رسول الله! أفلا أ*رقته؟() قال : لا. أما أنا فقد عافانى الله، وكرهت أن أثير على الناس شراً، فأمرت بها فدفنت()0
أنكر هذا ال*ديث بعض المبتدعة قديماً على ما *كاه عنهم غير وا*د من الأئمة قال الإمام النووى : "وقد أنكر بعد المبتدعة هذا ال*ديث بسبب أنه ي*ط من مقام النبوة وشرفها، ويشكك فيها، وأن تجويزه يمنع الثقة بالشرع"() وتابع المبتدعة طعناً فى ال*ديث أذيالهم من الرافضة، ودعاة اللادينية0

يقول أ*مد صب*ى منصور : "اتهام الرسول بالس*ر أو بأن بعضهم س*ره فيه تشكيك فى الرسالة، وطعن فى الدين() ويفقد المصداقية فى أى قول أو فعل يصدر منه، ومنه يدخل باب الشك فى الإسلام جملة وتفصيلاً، ويتعارض مع قوله تعالى : }وقال الظالمون إن تتبعون إلا رجلاً مس*وراً{()0

ويقول صال* الوردانى() : "وتأتى قضية الس*ر لتؤكد لنا مدى هامشية شخصية الرسول صلى الله عليه وسلم فى نظر أهل السنة، ومدى إهمال الو*ى له، *تى أن بعض الس*رة يس*رونه ويسيطرون عليه، فيفعل الشئ ولا يفعله، أو يتخيل فعل الشئ، وهذا يعنى أن السا*ر قد هيمن على الرسول نفسياً، ومن الممكن أن يقول على لسانه ما يشاء. ومرة أخرى يطر* السؤال : أين دور الو*ى…"()0
وتأثر بتلك الطعون من علماء المسلمين الإمام م*مد عبده() وتابعه على ذلك من سار على طريقته من علماء المسلمين، وقال بقولهم بعض أدعياء العلم0

قال الإمام م*مد عبده ر*مه الله : "نعلم أن البخارى أصدق كتاب بعد كتاب الله، وأنا لا أشك أن البخارى سمع هذا من أساتذته، والبخارى يشترط فى أ*اديثه المعاصرة واللقاء، إلا أننى أرى أن هذا لم ي*دث مع النبى صلى الله عليه وسلم ، وإن كان قد دس من الإسرائيليات إلى مشايخ البخارى الذين أخذ منهم، وإلا فإننا إن قد صدقنا أن النبى صلى الله عليه وسلم ، قد س*ر فقد صدقنا كلام الظالمين الذى *كاه القرآن عنهم، }وقال الظالمون إن تتبعون إلا رجلاً مس*ورا{() وإن صدقنا أن النبى صلى الله عليه وسلم قد س*ر، فقد كذبنا الله سب*انه وتعالى القائل فى كتابه ال*كيم : }إنهم عن السمع لمعزولون{() وقال عز وجل : }فمن يستمع الآن يجد له شهاباً رصدا{() ثم قال : وأما ال*ديث على فرض ص*ته فهو آ*اد، والآ*اد لا يؤخذ بها فى باب العقائد، وعصمة النبى من تأثير الس*ر فى عقله عقيدة من العقائد، لا يؤخذ فى نفيها عنه إلا باليقين، ولا يجوز أن يؤخذ فيها بالظن المظنون على أى *ال، فلنا بل علينا أن نفوض الأمر فى ال*ديث، ولا ن*كمه فى عقيدتنا، ونأخذ بنص الكتاب، وبدليل العقل، فإنه إذا خولط النبى صلى الله عليه وسلم فى عقله – كما زعموا – جاز عليه أن يظن أنه بلغ شيئاً، وهو لم يبلغه، أو أن شيئاً نزل عليه، وهو لم ينزل عليه، والأمر هنا ظاهر لا ي*تاج إلى بيان. ثم ختم كلامه قائلاً : أ*ب أن أكذب البخارى، من أن أنسب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ، أنه س*ر"()0

ويجاب عن الشبه السابقة بما يلى :
أولاً : إن ال*ديث ص*ي*، وثابت بأص* الأسانيد فى أص* الكتب بعد كتاب الله عز وجل فقد رواه الشيخان فى ص*ي*هما، ولا يص* لنا أن نقول بصدق البخارى ثم نكذب شيوخه، فإن ما يجرى على شيوخه، يجرى عليه، ولا يص* لنا أن نكذب البخارى وروايته، اعتماداً على رأى ليس له من *ظ فى توثيق الأخبار، وإقرار ال*قائق من قريب أو بعيد، ولو أننا سلمنا جدلاً بصدق معطيات العقل، لأتينا على كثير من السنة، بل وعلى كثير من آيات القرآن الكريم نفسه()0
ثانياً : قول الإسناد الإمام : بأن ال*ديث على فرض ص*ته فهو آ*اد، والآ*اد لا يؤخذ بها فى باب العقائد، لأنها لا تفيد إلا الظن، قول غير ص*ي*، لأن ال*ق الذى ترج*ه الأدلة الص*ي*ة، أن ال*ديث الص*ي*، مقطوع بص*ته، ويفيد العلم اليقينى النظرى، سواء كان فى أ*د الص*ي*ين أم فى غيرهما، وهذا العلم اليقينى نظرى برهانى، لا ي*صل إلا للعالم المتجر فى ال*ديث العارف بأ*وال الرواة والعلل، المميز بين ص*ي*ه وسقيمه، وغثه وثمينه، وأصيله ودخيله، أما من ليس من أهل هذا الشأن، فإن هذه القرائن ولو كثرت، لا تفيدهم علماً، فمثلهم لا يعتد به فى هذا المقام، ولا تبنى عليه هنا الأ*كام()0

هذا مع العلم بأن التفرقة بين العقائد والأ*كام فى العمل بخبر الوا*د، لا تعرف عن أ*د من الص*ابة، ولا عن أ*د من التابعين، ولا من تابعهم، ولا عن أ*د من أئمة الإسلام، وإنما تعرف عن رءوس أهل البدع ومن تبعهم0

يقول الإمام ابن د*ية() : "وعلى قبول خبر الوا*د الص*ابة والتابعون وفقهاء المسلمين، وجماعة أهل السنة، يؤمنون بخبر الوا*د، ويدينون به فى الاعتقادات"()0

ثالثاً : قول الأستاذ الإمام عن *ديث الس*ر : وعلى أى *ال، فلنا بل علينا أن نفوض الأمر فى ال*ديث، ولا ن*كمه فى عقيدتنا، ونأخذ بنص الكتاب، وبدليل العقل. فهذا كلام خطير جداً يفت* ثغرة ضد الثابت الص*ي* من السنة، كما يفت* مجالاً لقالة السوء فى الصدام بين الكتاب والسنة، والأمر ليس كذلك، بينما *دد لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فى *ديثه الص*ي* : "إنى قد تركت فيكم ما إن اعتصمتم به فلن تضلوا أبداً كتاب الله، وسنة نبيه صلى الله عليه وسلم "() كما أن الأستاذ الإمام بجعله الأخذ بالكتاب، وبدليل العقل فقط، ترك فرصة للهجوم عليه، مما دفع تلميذه م*مد رشيد رضا() إلى القول : بأن الأستاذ الإمام كان ضعيفاً فى ال*ديث، كما أنه و*تى الآن م*ل نقد من رجال السنة، مما جرهم إلى التهجم عليه، وعلى أفكاره، بينما أبان هو عن هدفه من ذلك وجعله م*دداً فى قوله : "وقد قال الكثير من المقلدين الذين لا يعقلون ما هى النبوة، ولا ما يجب لها، أن الخبر بتأثير الس*ر فى النفس الشريفة قد ص* فليزم الاعتقاد به"0
ويبدو أن الأستاذ الإمام قد أبدى بعض التراجع عن هذه الفكرة عندما قال : "ثم إن نفى الس*ر عنه لا يستلزم نفى الس*ر مطلقاً" مع أنه قد أقر سابقاً بأن الس*ر إما *يلة وشعوذة، وإما صناعة علمية خفية، يعرفها بعض الناس، ويجهلها الأكثرون… إلى أن قال : أن الس*ر يتلقى بالتعليم، ويتكرر بالعمل فهو أمر عادى قطعاً بخلاف المعجزة، ثم يجعل بعد ذلك نفى الس*ر بالمرة ليس بدعة، لأن الله تعالى لم يذكره ضمن آية }آمن الرسول بما أنزل إليه من ربه والمؤمنون كل آمن بالله وملائكته وكتبه ورسله لا نفرق بين أ*د من رسله وقالوا سمعنا وأطعنا غفرانك ربنا وإليك المصير{() ويجعل س*ر س*رة فرعون ضرباً من ال*يلة ويستدل بقوله تعالى : }يخيل إليه من س*رهم أنها تسعى{() وما قال أنها تسعى بس*رهم0

مع أن أقوى دليل يمكن أن ترد به على الأستاذ الإمام قوله تعالى : }قال ألقوا فلما ألقوا س*روا أعين الناس واسترهبوهم وجاءوا بس*ر عظيم{() فكيف غاب عن الأستاذ الإمام النظر فى هذه الآية، وكيف كان يمكن له أن يفسرها على خلاف ما هى عليه من إثبات *قيقة الس*ر لا كونه تخييلاً أو وهماً0
وهل يأمر رب العزة بالاستعاذة من وهم وتخيل فى قوله : }ومن شر النفاثات فى العقد{؟() وهو يعنى بالنفاثات السوا*ر إذا رقين ونفثن فى العقد؟()0

أما ال*ديث فقد ثبت فى ص*ي* البخارى، وهو مرجع أساسى للسنة، فلو شككنا فى *جية الثابت فى البخارى، فكيف يقبل الناس بعد ذلك *ديثاً ورد فى كتب الص*ا* أو فى رواية عن غير البخارى؟!0

وما دفع الأستاذ الإمام من عاطفة تنزيه مقام النبوة أو م*اولة إظهار الإسلام بمظهر لا يكون فيه موضع اتهام من أعداء الإسلام، أو م*اربة الس*ر كخرافة، بعد أن توسع الناس فى عمل أشياء تتنافى مع عظمة الإسلام، وإنكاره لمظاهر الكهانة والس*ر والشعوذة0

وهذه إن جاز أن تكون دوافع الأستاذ الإمام فلا يجوز أن تكون ب*يث تصادم الثابت الص*ي*، وهو الذى كثيراً ما وقف عند الثابت عن المعصوم صلى الله عليه وسلم لا يتعداه، ولا ي*اول تأويله، ويسلم به تسليم معتقد لما جاء به، *يث لا مجال للعقل فيه0

ثم ما هو الدافع؛ لأن يتأثر الأستاذ الإمام بالمعتزلة فى ذلك، وي*اكى رأيهم، وهو الذى كثيراً ما نعى على التقليد والمقلدين، وكان أولى به أن يأخذ برأى الإمام ابن قيم الجوزية، عندما قال فى هذا الشأن : "وأما قولكم أن س*ر الأنبياء ينافى *ماية الله لهم، قيل لكم : إنه سب*انه كما ي*ميهم، ويصونهم، وي*فظهم، ويتولاهم، يبتليهم بما شاء من أذى الكفار لهم، ليستوجبوا كمال كرامته، وليتأسى بهم من بعدهم من أممهم، إذا أوذوا من الناس، فرأوا ما جرى على الرسل والأنبياء، صبروا، ورضوا، وتأسوا بهم"()0

ومن أجل ذلك أثبت علماء الإسلام هذا ال*ديث، وأوجدوا له مخرجاً يتفق مع سلامة النسبة إليه، ومع مكانة النبوة، وعصمته صلى الله عليه وسلم ، فقالوا :
أولاً : الزعم بأن ال*ديث ي*ط من منصب النبوة، ويشكك فيها، وفى عصمة الأنبياء، وأن تجويزه يمنع الثقة بالشرع، هذا الذى ادعاه هؤلاء المبتدعة باطل؛ لأن الدلائل القطعية قد قامت على صدقه وص*ته، وعصمته فيما يتعلق بالتبليغ، والمعجزة شاهدة بذلك، وتجويز ما قام الدليل بخلافه باطل()0
ثانياً : أن س*ر الرسول صلى الله عليه وسلم ، يرفع من مقام النبوة وشرفها، ولا ي*ط من شأنها، ولا يتعارض مع عصمته صلى الله عليه وسلم ، فالرسول صلى الله عليه وسلم لم يكن معصوماً من الأمراض، فلقد كان يأكل، ويشرب، ويمرض، كما قالت عائشة رضى الله عنها "إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان رجلاً مسقاماً،وكان أطباء العرب يأتونه فأتعلم منهم"() وكانت تجرى عليه كل النواميس المعتادة التى أودعها الله فى ولد آدم، وليس فى الس*ر على الهيئة الواردة ما ينقص من قدره وعصمته كإمام لسائر الأنبياء والمرسلين، مادام الس*ر على قواه البدنية()0

قال القاضى عياض : "وقد جاءت راويات هذا ال*ديث مبينة أن الس*ر إنما تسلط على جسده، وظواهر جوار*ه، لا على عقله وقلبه واعتقاده، ويكون معنى قوله فى ال*ديث : "*تى يظن أنه يأتى أهله ولا يأتيهن" ويروى : "يخيل إليه" بالمضارع كلها : أى يظهر له من نشاطه ومتقدم عادته القدرة عليهن، فإذا دنا منهن أخذته أخذة الس*ر فلم يأتهن، ولم يتمكن من ذلك كما يعترى المس*ور0

قلت : وهذا مثل ما يعترى الرجل السليم قوى البدن، الم*طم للأرقام القياسية فى رفع الأثقال، يظن ت*طيم رقم قياسى أعلى، وعند م*اولة الرفع لا يستطيع، ومثل ذلك أيضاً الإنسان فى *الة النقاهة من المرض، يظن أن به قدرة على ال*ركة، وعندما يهم بذلك لا ت*تمله قدماه0

قال القاضى عياض : وكل ما جاء فى الروايات من أنه يخيل إليه فعل الشئ ولم يفعله ون*وه، فم*مول على التخيل بالبصر، لا لخلل تطرق إلى العقل، وليس فى ذلك ما يدخل لبساً على تبليغه أو شريعته، أو يقد* فى صدقه لقيام الدليل والإجماع على عصمته من هذا() فلا مطعن لأهل الضلالة"() ثم إنه لم يثبت، بل ولم يرد أنه صلى الله عليه وسلم تكلم بكلمة وا*دة فى أثناء مدة الس*ر تدل على اختلال عقله صلى الله عليه وسلم ، ولا أنه قال قولاً فكان بخلاف ما أخبر به، ومن نفى فعليه بالدليل ولا دليل() وكل هذا يوض* كيف أخطأ خصوم السنة والسيرة العطرة فى تفسير الس*ر، وأنه أثر على عقله صلى الله عليه وسلم - عصمه الله من ذلك0

ثالثاً : أن عصمة الرسول صلى الله عليه وسلم الواردة فى قوله تعالى : }يا أيها الرسول بلغ ما أنزل إليك من ربك وإن لم تفعل فما بلغت رسالته والله يعصمك من الناس{() العصمة هنا المراد بها عصمته صلى الله عليه وسلم من القتل، والاغتيال، والمكائد المهلكة، فضلاً عن عصمته من الغواية، والهوى، والضلال، وعدم الوقوع فى المعاصى والمنكرات، ولا يدخل فى العصمة هنا عصمته من الأمراض كما سبق أن ذكرت، بل الأنبياء جميعاً غير معصومين من المرض غير المنفر، فهم جميعاً تجرى عليهم كل النواميس المعتادة التى أودعها الله فى ولد آدم، وعلى ذلك فالآية ليست على عمومها، ولو كانت على عمومها ما استطاع أ*د أن يخطئ فى *قه صلى الله عليه وسلم ، ولا أن يناله بأذى، وهاهم يخطئون فى *قه صلى الله عليه وسلم كثيراً، بوصفه بالجنون والكهانة، والس*ر، وينالون منه فى المعارك بكسر رباعيته، وشج رأسه، وهذا يدل على أن الآية فى عصمته من القتل، والغواية، والضلال، ولا تعارض بينهما وبين شخص يس*ره()0
رابعاً : أن القول بأن ال*ديث معارض للقرآن الكريم، ويصدق المشركين فى قولهم : }إن تتبعون إلا رجلاً مس*وراً{() مردود بأن المشركين كانوا يقولون إن م*مداً بشر، وأنه فقير، وأنه لا يعلم الغيب، فهل نكذبهم فى ذلك؟!0
ثم إننا نعلم يقيناً، أن الكفار لا يريدون بقولهم هذا، أن يثبتوا لرسول الله صلى الله عليه وسلم ما أثبته هذا ال*ديث، وهو أن فلاناً من اليهود س*ره بضعة أيام، فأدركه شئ من التغير، وخيل إليه أنه يفعل بعض الشئ، وهو لا يفعله، ثم أن الله شفاه من ذلك، هم لا يريدون هذا، بل يريدون أن ما يصدر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، إنما يصدر عن خيال وجنون، وأنه لم يو* إليه شئ، فإذا آمنا بما دل عليه ال*ديث لم نكن مصدقين للمشركين فى دعواهم، فمفهوم ال*ديث شئ، ودعواهم شئ آخر0
خامساً : زعمهم أن الس*ر من عمل الشياطين، وصنع النفوس الشريرة الخبيثة، أما من ت*صن بعبادة الله كالأنبياء، فليس للشيطان، ولا للشريرين عليهم من سلطان، قال تعالى : }إن عبادى ليس لك عليهم سلطان إلا من اتبعك من الغاوين{()0

هذا الزعم مردود عليهم بما ورد فى القرآن الكريم من آيات تثبت تعرض الشيطان للأنبياء بأنواع الإفساد والإغواء، ومع ذلك عصمهم الله عز وجل بعدم تمكنه من إغوائهم، أو إل*اق ضرر بهم يضر بالدين، وتأمل قوله تعالى : فى *ق سيدنا أيوب عليه السلام }واذكر عبدنا أيوب إذ نادى ربه أنى مسنى الشيطان بنصب وعذاب{() وقوله سب*انه فى *ق سيدنا آدم وزوجته : }فأزلهما الشيطان عنها فأخرجهما مما كانا فيه{() ومن هنا لا يلزم من وقوع الس*ر فى *ق الأنبياء، إضلالهم وإغوائهم، فإن ذلك ظن فاسد، وتأمل قوله تعالى : }قالوا يا موسى إما أن تلقى وإما أن نكون أول من ألقى. قال بل ألقوا فإذا *بالهم وعصيهم يخيل إليه من س*رهم أنها تسعى. فأوجس فى نفسه خيفة موسى. قلنا لا تخف إنك أنت الأعلى. وألقى ما فى يمينك تلقف ما صنعوا إنما صنعوا كيد سا*ر ولا يفل* السا*ر *يث أتى{() فقد صر*ت الآيات بأن س*ر أولئك الس*ار، قد أوقع نبى الله موسى فى التخييل، *تى تغيرت أمامه ال*قائق، ف*سب ال*بال *يات، والساكنات مت*ركات، وعندما أوجس فى نفسه من ذلك خيفة، كانت عصمة ربه له بالو*ى إليه بعدم الخوف لأنه رسول الله *قاً، وعليه إلقاء ما فى يمينه يعنى عصاه فإذا هى }تلقف ما صنعوا إنما صنعوا كيد سا*ر ولا يفل* السا*ر *يث أتى{ فتأمل ما فى الآيات من إثبات الس*ر للأنبياء مع عصمتهم من آثاره المضرة بدعوتهم0
وهكذا يتض* أن ال*ديث لا يتعارض مع أى آية من القرآن الكريم، بل آيات القرآن الكريم تؤيده ن*و قوله تعالى : }قل أعوذ برب الفلق. من شر ما خلق. ومن شر غاسق إذا وقب. ومن شر النفاثات فى العقد. ومن شر *اسد إذا *سد{() فهذه السورة وسورة الناس، واللتين تسميان بالمعوذتين، نزلتا فى قصة س*ره صلى الله عليه وسلم ، كما جاء من *ديث ابن عباس() ومن *ديث عائشة أيضاً ففيه من الزيادة أنه "وجد فى الطلعة تمثالاً من شمع، تمثال رسول الله صلى الله عليه وسلم وإذا فيه إبر مغروزة، وإذا وتر فيه إ*دى عشرة عقدة، فنزل جبريل بالمعوذتين، فكلما قرأ آية ان*لت عقدة، وكلما نزع إبرة وجد لها ألماً، ثم يجد بعدها را*ة"() *تى قام رسول الله صلى الله عليه وسلم ، كأنما نشط من عقال، أى من *بل كان مربوطاً به0
وهنا قد يرد سؤال : إذا كانت عصمة الله وعنايته أ*اطت رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم أثر فيه الس*ر؟0
والجواب : لتتعلم الأمة كيف تعالج نفسها من الس*ر، إذا وقع لوا*د من أبنائها شئ من الس*ر، وهو علاج من أربعة أمور وردت فى ال*ديث :
الأول : الصبر على البلاء، ابتغاء الأجر والمثوبة الواردة فى قوله صلى الله عليه وسلم : "ما يزال البلاء بالمؤمن والمؤمنة فى نفسه، وولده، وماله، *تى يلقى الله وما عليه خطيئة"() وكذلك الأنبياء يبتلون ابتغاء أجر البلاء وهو فى *قهم لرفعة درجاتهم، وإظهاراً لشرفهم، كما قال عز وجل: }ولنبلونكم *تى نعلم المجاهدين منكم والصابرين ونبلو أخباركم{() وفى ال*ديث عن سعد بن أبى وقاص رضى الله عنه قال : قلت : يا رسول الله! أى الناس أشد بلاءاً قال : الأنبياء ثم الأمثل فالأمثل، فيبتلى الرجل على *سب دينه، فإن كان دينه صلباً اشتد بلاؤه، وإن كان فى دينه رقة ابتلى على *سب دينه، فما يبر* البلاء بالعبد، *تى يتركه يمشى على الأرض وما عليه خطيئة"() ومن هنا صبر رسول الله صلى الله عليه وسلم على س*ره ي*تسب أجر ذلك عند الله تعالى0
الثانى : كثرة الدعاء، ففى ال*ديث الذى معنا صبر صلى الله عليه وسلم فترة، ثم دعا، ودعا، ودعا. وفى هذا تعليم للأمة، أنه للمبتلى منها عليه بكثرة الدعاء، فإنه ببركة الدعاء، يفرج الله عنه ما هو فيه، قال تعالى : }وقال ربكم ادعونى أستجب لكم{() وقال صلى الله عليه وسلم : "لا يرد القضاء إلا الدعاء"()0
الثالث : الرقية، وذلك بقراءة سورتى }قل أعوذ برب الفلق{ و}قل أعوذ برب الناس{() ففى بعض روايات هذا ال*ديث على ما سبق قريباً أنه صلى الله عليه وسلم ، رقى بهاتين السورتين، وكلما رقى بآية ان*لت عقدة، *تى ان*لت العقد كلها، وشفى بفضل الله تماماً0
وفى سورتى الفلق والناس واللتين تسميان بالمعوذتين، فيهما يقول صلى الله عليه وسلم : "ما سأل سائل بمثلهما، ولا استعاذ مستعيذ بمثلهما"()0
الرابع : النشرة() وهى مبا*ة، وهذه الإبا*ة مستفادة من قول عائشة رضى الله عنها : "هلا تنشرت" ولم ينكر عليها صلى الله عليه وسلم قولها0
وذكر الإمام البخارى عن سعيد بن المسيب() بأنه سئل عن النشرة للذى يؤخذ عن أهله، فقال : لا بأس! لم ينه عن الصلا*، إنما نهى عن الفساد، ومن استطاع ان ينفع أخاه فليفعل()0
ومن الناس من كره النشرة على العموم، ونزع ب*ديث خرجه أبو داود مرفوعاً "هو من عمل الشيطان"()0
قال ال*افظ ابن *جر : "ويجاب عن ال*ديث، بأنه إشارة إلى أصلها، ويختلف ال*كم بالقصد، فمن قصد بها خيراً كان خيراً، وإلا فهو شر"() وقال الإمام السهيلى : النشرة من عمل الشيطان، هذا والله أعلم فى النشرة التى فيها الخواتم والعزائم، وما لا يفهم من الأسماء العجمية()0
وبعد : فإن *ديث س*ر رسول الله صلى الله عليه وسلم ، لا يتعارض مع عصمته صلى الله عليه وسلم ولا يشكك فى النبوة، كما أنه لا يمثل ثغره فى السنة والسيرة العطرة، وإنما يمثل نقطة مشرقة، إنه س*ر، لكنه لم يخرج عن دائرة الصواب، بل كان فى أعلى درجات الاستقامة والهداية، وهذا يدل على أن الس*ر لم يؤثر فى قواه صلى الله عليه وسلم العقلية، ولا فى درجته الإيمانية، وإنما كان مؤثراً فى أداء الجسم، وهذا لا علاقة له بالرسالة والو*ى، والعصمة، ومع أنه أمر جسدى، فإن الرعاية الإلهية قد شملته، وتولاه الله بال*فظ، وسلمه سب*انه وشفاه، بعد أن أطلعه عز وجل على المكيدة التى صنعها له لبيد بن الأعصم فى الس*ر، فذهب إلى *يث قد طوى الرجل أمشاطه، وأسباب س*ره، فأبطل صلى الله عليه وسلم كل ذلك0
وهكذا فأنت ترى أن هذا ال*ديث دليل إكرام وعصمة من الله عز وجل لرسوله صلى الله عليه وسلم أكثر من كونه دليل أذى قد أصابه فى جسمه، أو أى جانب يتعلق ببشريته() أهـ.

والله تبارك وتعالى أعلى وأعلم
المطلب الخامس
شبهة الطاعنين فى *ديث "أَهَجَرَ"
والرد عليها"

روى البخارى ومسلم وغيرهما من *ديث ابن عباس رضى الله عنهما قال : "لما *ضر رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وفى البيت رجال فيهم عمر بن الخطاب، فقال النبى صلى الله عليه وسلم : "هلم أكتب لكم كتاباً لا تضلون بعده" فقال عمر : إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد غلب عليه الوجع، وعندكم القرآن، *سبنا كتاب الله، فاختلف أهل البيت فاختصموا، فمنهم من يقول : قربوا يكتب لكم رسول الله صلى الله عليه وسلم كتاباً لن تضلوا بعده، ومنهم من يقول : ما قال عمر. فلما أكثروا اللغو والاختلاف عند رسول الله صلى الله عليه وسلم ، قال عليه الصلاة والسلام : قوموا، وكان ابن عباس يقول : إنا الرزية كل الرزية ما *ال بين رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وبين أن يكتب لهم ذلك الكتاب، من اختلافهم ولغطهم"()0

هذا ال*ديث طعن فيه الرافضة، بما جاء فى بعض رواياته من قول بعض ال*اضرين "أهجر" وزعموا كذباً نسبة هذه اللفظة إلى سيدنا عمر بن الخطاب رضى الله عنه، وأنه بقوله "أهجر" ورفعه شعار "*سبنا كتاب الله" تجاوز *د الأدب مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وطعن فى شخصه الكريم، واتهامه بالتخريف والهذيان، كما زعموا أن تبرير الفقهاء لموقف عمر تشويه لرسول الله صلى الله عليه وسلم ، و*ط من قدره وشخصه، ومكانته العالية، ومساس بعصمته ورسالته()0
يقول : أ*مد *سين يعقوب() : "أول من اتهم رسول الله صلى الله عليه وسلم بالهجر، ورفع بوجهه شعار "*سبنا كتاب الله" هو عمر بن الخطاب، *يث *ضر هو وثلة من *زبه ليطمئنوا على الوضع الص*ى لرسول الله، ومن المؤكد أن شخصاً ما أخبر عمر بأن الرسول سوف يكتب وصية تلك الليلة، فأ*ضر عمر عدداً كبيراً من *زبه لي*ول بين الرسول، وبين كتابة وصيته كما أقر عمر بذلك. وما أن قال الرسول : "قربوا كتب لكم كتاباً لن تضلوا بعده أبداً" *تى تصدى له عمر بن الخطاب، فقال فوراً دون أن يسأل عن مضمون الكتاب : "*سبنا كتاب الله، إن رسول الله قد هجر" وبدون تروى صا* ال*اضرون من *زب عمر فقالوا : القول ما قاله عمر!! إن رسول الله يهجر، واستغرب ال*اضرون من غير *زب عمر، وصعقوا من هول ما سمعوا، فقال عفوياً : قربوا يكتب لكم رسول الله، وكان ال*اضرون من *زب عمر يشكلون الأكثرية، لأنهم أعدوا للأمر عدته فصا* عمر وأعوانه : "*سبنا كتاب الله إن الرسول يهجر" واختلف الفريقان وتنازعوا، وصدم عمر و*زبه خاطر النبى، فقال النبى للجميع : "قوموا عنى، ولا ينبغى عندى التنازع، وما أنا فيه خير مما تدعونى إليه" ولقد أصاب ابن عباس عندما سمى ذلك اليوم بيوم الرزية!!!" ()0

ويجاب عن الشبهات السابقة بما يلى :
أولاً : نسبة القول بـ "أَهَجَر" إلى الفاروق عمر بن الخطاب، لا دليل عليه، إذ جميع روايات هذا ال*ديث تنفى هذه الكلمة إلى عمر رضى الله عنه. وإنما الذى جاء على لسان عمر فى جميع الروايات : قال ابن عباس : "فقال عمر : إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد غلب عليه الوجع، وعندكم القرآن، *سبنا كتاب الله"()0
أما لفظ "أَهَجَر" فجاءت جميع الروايات بنسبتها إلى بعض ال*اضرين فى بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم دون ت*ديد لأشخاصهم، قال ابن عباس : "فقالوا ما شأنه؟ أهجر! استفهموه"()0

فأين إذن ما يزعمه الرافضة من نسبة هذه الكلمة إلى سيدنا عمر رضى الله عنه؟0

إنه لا وجود لهذه النسبة إلا فى أذهانهم المريضة، وقلوبهم الممتلئة *قداً على ص*ابة رسول الله صلى الله عليه وسلم !!0
ثانياً : ليس فى كلمة "أهجر" ما يعارض عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم فى عقله، وفى الو*ى وتبليغ الرسالة، *ال ص*ته، و*ال مرضه يبين ذلك ضبط الكلمة المبين *قيقة المراد منها وهو سلب الهجر لا إثباته، و*اصل هذا الضبط فيما يلى :
أ- إثبات همزة الاستفهام، وبفت*ات عليها، "أَهَجَرَ" على أنه فعل ماض، والكلمة فى هذه ال*الة، على سبيل الاستفهام الإنكارى على من توقف فى امتثال أمره صلى الله عليه وسلم ، بإ*ضار الكتف والدواة. فكأن قائلها قال : كيف تتوقف فى امتثال أمره صلى الله عليه وسلم ، أتظن أنه صلى الله عليه وسلم كغيره يقول الهذيان فى مرضه، امتثل أمره، وأ*ضره ما طلب فإنه لا يقول إلا ال*ق0

وهذا الضبط والمراد به، هو أ*سن الأجوبة، وأرج*ها عند ال*افظ ابن *جر، والقرطبى فى توجيه هذه الكلمة() وهو ما أرج*ه أيضاً0

ب- وضبطها بعضهم : "أهُجْراً" بضم الهاء، وسكون الجيم، والتنوين والكلمة فى هذه ال*الة راجعة إلى المختلفين عند رسول الله صلى الله عليه وسلم وقائلها خاطبهم بها، والمراد : جئتم باختلافكم عند رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وبين يديه هجراً ومنكراً من القول()0

وهذا الضبط الثانى والمراد به، تثبته الروايات، وما جاء فيها من كثرة لغطهم ولغوهم0

ثالثاً : اتفق العلماء على أنه لا يص* أن تكون هذه الكلمة "أهجر" إخباراً، لأن الهجر بالضم، ثم السكون، من الف*ش أو الهذيان، والمراد به هنا : ما يقع من كلام المريض الذى لا ينتظم، ولا يعتد به لعدم فائدته(). ووقوع ذلك من النبى صلى الله عليه وسلم مست*يل فى *قه، لأنه معصوم فى ص*ته ومرضه، لقوله تعالى : }وما ينطق عن الهوى{() ولقوله صلى الله عليه وسلم : "فوالذى نفسى بيده ما يخرج منه (أى من فمه الشريف فى *ال غضبه، ورضاه، وكذا ص*ته ومرضه)، إلا *ق"()0
وعلى هذا لا يص* ظاهر رواية من روى فى ال*ديث "هجر" أو "يهجر"() وهى م*مولة عند أهل العلم على وجهين :
الوجه الأول : *ذف ألف الاستفهام، والتقدير أهجر؟0
ويؤيد ص*ة هذا ال*مل، أنه لو ا*تمل من بعض الص*ابة أنه قال تلك الكلمة، إخباراً عن *ال رسول الله صلى الله عليه وسلم ، أو عن شك عرض له فى عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم *ال مرضه، لوجد من ينكره عليه من كبار الص*ابة، بل من رسول الله صلى الله عليه وسلم نفسه رداً عن عصمته، ولو ثبت الإنكار من الص*ابة أو الرسول، لنقل إلينا، ولا نقل! وهو ما يؤكد ص*ة هذا الم*مل0

الوجه الثانى : فى المراد بظاهر رواية "هجر" و"يهجر" هو *ملها على ما جاء فى الرواية الثانية من قول الفاروق عمر : "إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد غلبه الوجع" ويكون قائل "هجر" أو "يهجر" لم يضبط لفظه، وأجرى الهجر، مجرى شدة الوجع، لأنه ينشأ منه، لا أنه اعتقد أنه صلى الله عليه وسلم يجوز عليه الهجر، وإلا وجد من ينكر عليه كما سبق0
هذا وقيل غير ذلك من الأقوال فى توجيه كلمة "هجر" و"يهجر" فاقتصرت على ما سبق لكونه أرج* عندى من غيره()0
وعلى ما سبق فليس فى قول القائل "أَهَجَر" أياً كان قائلها، كما أنه ليس فى قول عمر رضى الله عنه : "إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد غلبه الوجع" ما يتعارض مع عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، ولا ما يشوه شخصيته، وي*ط من قدره كما يزعم الرافضة! لأن قائل "أهجر" أو "أهجراً" كان القول منه سلباً للهجر لا إثباته، وإنكاراً منه على من توقف فى امتثال أمره صلى الله عليه وسلم ، وإنكاراً أيضاً على المختلفين بين يديه صلى الله عليه وسلم ، وما أ*دثوه ب*ضرته من لغط ولغو. ولو *ملت الكلمة من قائلها، على الإخبار ب*اله عليه الصلاة والسلام لوجد من ينكر على قائلها، وعلى رأسهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ينكر ذلك، ولنقل إلينا، ولا نقل! مما يؤكد أن قائل "أهجر" قصد بها سلب الهجر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، لا إثباته كما يزعم الرافضة!0
رابعاً : اتفق قول العلماء – سوى الرافضة – على أن قول عمر "إن رسول الله، قد غلبه الوجع، عندكم القرآن، *سبنا كتاب الله" رد على من نازعه، لا على أمر النبى صلى الله عليه وسلم 0
كما أن العلماء عدو قوله : من قوة فقهه، ودقيق نظره، ومن موافقاته للو*ى، قصد منه التخفيف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، *ين رآه قد غلب عليه الوجع، وشدة الكرب، وقامت عنده قرينه بأن الذى أراد كتابته، ليس مما لا يستغنون عنه، إذ لو كان من هذا القبيل، لم يتركه عليه الصلاة والسلام، لأجل اختلافهم ولغطهم، لقوله تعالى : }يا أيها الرسول بلغ ما أنزل إليك من ربك وإن لم تفعل فما بلغت رسالته والله يعصمك من الناس{()0
كما لم يترك صلى الله عليه وسلم تبليغ غيره بمخالفة من خالفه، ومعاداة من عاداه، وفى تركه عليه الصلاة والسلام، الإنكار على عمر إشارة إلى تصويبه صلى الله عليه وسلم رأيه()0
قلت : وهذا عندى من أقوى ما يتمسك به فى الرد على الرافضة ومن قال بقولهم، لأن ترك رسول الله صلى الله عليه وسلم الإنكار على عمر، هو إقرار منه صلى الله عليه وسلم بتصويب رأيه، ويأخذ هذا الإقرار *كم المرفوع المسند0
ويؤيد ص*ة ما سبق، من ص*ة رأى عمر، وأن أمره صلى الله عليه وسلم بالكتابة لم يكن على سبيل الوجوب، ما جاء فى نفس ال*ديث من وصيته عليه الصلاة والسلام بثلاث قال : "اخرجوا المشركين من جزيرة العرب، وأجيزوا الوفد بن*و ما كنت أجيزهم() وسكت عن الثالثة أو قال الراوى : فنسيتها"()0
فهذا يدل على أن الذى أراد أن يكتبه صلى الله عليه وسلم ، لم يكن أمراً مت*تماً، لأنه لو كان مما أمر بتبليغه، لم يكن يتركه لوقوع اختلافهم، ولعاقب الله عز وجل، من *ال بينه وبين تبليغه، ولبلغه لهم لفظاً، كما أوصاهم بإخراج المشركين وغير ذلك0
وقد عاش عليه الصلاة والسلام بعد هذه المقالة أياماً، و*فظوا عنه أشياء لفظاً، في*تمل أن مجموعها ما أراد أن يكتبه ويبعد مع كل هذا أن يكون أمره صلى الله عليه وسلم بالكتابة على الوجوب ويتركه!0
كما يبعد كل البعد، بدليل ما سبق، ما يزعمه الرافضة من الوصية لعلى بن أبى طالب رضى الله عنه، بالخلافة من بعده عليه الصلاة والسلام، وزعمهم أن عمر رضى الله عنه، *ال بين رسول الله، وبين كتابة تلك الوصية()0
قال الإمام المازرى() : "وإنما جاز للصا*بة الاختلاف فى هذا الكتاب، مع صري* أمره صلى الله عليه وسلم لهم بذلك، لأن الأوامر قد يقارنها ما ينقلها من الوجوب، فكأنه ظهرت منه عليه الصلاة والسلام قرينة دلت على أن الأمر ليس على الت*تم، بل على الاختيار، فاختلف اجتهادهم، وصمم عمر رضى الله عنه، على الامتناع، لما قام عنده من القرائن، بأنه صلى الله عليه وسلم قال ذلك من غير قصد جازم، وعزمه صلى الله عليه وسلم على الكتابة كان إما بالو*ى، وإما بالاجتهاد، وكذلك تركه صلى الله عليه وسلم الكتابة إن كان بالو*ى فبالو*ى، وإلا فبالاجتهاد أيضاً، وفيه *جة لمن قال بالرجوع إلى الاجتهاد فى الشرعيات"() وهو ما ينكره الرافضة على ص*ابة رسول الله صلى الله عليه وسلم ()0
قلت : وفى كلا ال*التين العزم على الكتابة وتركها، سواء كان بالو*ى، أو بالاجتهاد، فيه إقرار من رسول الله صلى الله عليه وسلم لرأى عمر رضى الله عنه، فيأخذ *كم المرفوع المسند، وهو دليل على ص*ة موقف الص*ابة رضى الله عنهم من اختلافهم فى الكتاب، مع صري* أمره صلى الله عليه وسلم 0
قال الإمام القرطبى() : "واختلاف الص*ابة رضى الله عنهم، فى هذا الكتاب كاختلافهم فى قوله صلى الله عليه وسلم : "لا يصلين أ*د العصر إلا فى بنى قريظة"() فتخوف ناس فوات الوقت فصلوا، وتمسك آخرون بظاهر الأمر فلم يصلوا، فما عنف صلى الله عليه وسلم أ*د منهم، من أجل الاجتهاد المسوغ، والمقصد الصال*"()0
وعلى ما سبق من اختلاف الص*ابة رضى الله عنهم، فى فهم أمره صلى الله عليه وسلم ، ثم إقراره صلى الله عليه وسلم لهذا الاختلاف فى فهمهم لأمره، يرد على زعم الرافضة، ومن قال بقولهم، فى أن اختلاف الص*ابة، فى أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالكتابة، سوء أدب منهم، مع رسول الله صلى الله عليه وسلم !!0
لأنهم رضوان الله عليهم أجمعين، كانوا يراجعونه صلى الله عليه وسلم فى بعض الأمور قبل أن يجزم فيها بت*تيم، كما راجعوه يوم ال*ديبية، فى كتاب الصل* بينه وبين قريش(). فأما إذا أمر عليه الصلاة والسلام بالشئ أمر عزيمة، ولا قرينة تصرفه عن ذلك، فلا يراجع فيه أ*د منهم()0
خامساً : زعم الرافضة أن فى قول عمر : "*سبنا كتاب الله" دعوى منه للاكتفاء به عن بيان السنة، زعم لا دليل عليه، لأن سيدنا عمر رضى الله عنه لم يرد بقوله هذا، الاكتفاء به عن بيان السنة المطهرة، بل قال ما قاله لما قام عنده من القرينة، على أن الذى أراد صلى الله عليه وسلم كتابته مما يستغنى عنه، بما فى كتاب الله عز وجل، لقوله تعالى : }ما فرطنا فى الكتاب من شئ{() *يث لا تقع واقعة إلى يوم القيامة، إلا وفى الكتاب، أو السنة بيانها نصاً أو دلالة0
وفى تكلف النبى صلى الله عليه وسلم فى مرضه من شدة وجعه، كتابة ذلك مشقة ومن هنا رأى عمر، الاقتصار على ما سبق بيانه إياه نصاً أو دلالة تخفيفاً عليه صلى الله عليه وسلم ، ولئلا ينسد باب الاجتهاد على أهل العلم والاستنباط، وإل*اق الفروع بالأصول، وقد كان سبق قوله صلى الله عليه وسلم : "إذا *كم ال*اكم فاجتهد ثم أصاب، فله أجران، وإذا *كم فاجتهد ثم أخطأ، فله أجر"()0

وهذا دليل على أنه صلى الله عليه وسلم وكل بعض الأ*كام إلى اجتهاد العلماء، وجعل لهم الأجر على الاجتهاد، فرأى عمر رضى الله عنه الصواب تركهم على هذه الجملة، لما فيه من فضيلة العلماء بالاجتهاد، مع التخفيف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ، وفى تركه عليه الصلاة والسلام الإنكار على عمر، دليل على استصوابه رضى الله عنه رغم أنف الرافضة()0

ولا يعارض ذلك قول ابن عباس رضى الله عنهما : إن الرزية كل الرزية … الخ لأن عمر كان أفقه منه قطعاً، هذا مع اعترافنا بأنه *بر الأمة، وترجمان القرآن، وأعلم الناس بتفسير كتاب الله وتأويله، ولكنه أسف على ما فاته من البيان بالتنصيص عليه، لكونه أولى من الاستنباط، لاسيما وقد بقى ابن عباس *تى شاهد الفتن(). أهـ0

وبعــد :
فقد استبان لك أيها الناظر بما سبق؛ عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فى بدنه من الصرع() وفى عقله وقلبه من الكفر() والشرك والضلال والغفلة() والشك، والف*ش، ومن تسلط الشيطان عليه() واست*الة ذلك ون*وه عليه شرعاً وإجماعاً، ونظراً وبرهاناً وعصمته فيما سبق قبل النبوة وبعدها، وفى كل *الاته من رضى وغضب، وجد ومز*0

وما استدل به أعداء السنة المطهرة، والسيرة العطرة من أ*اديث يفيد ظاهرها عدم عصمة رسول الله صلى الله عليه وسلم فى عقله وبدنه لا تفيدهم فى دعواهم، لأن ما استدلوا به من أ*اديث، منها ما هو ضعيف، وموضوع لا ي*تج به، ومنهما ما هو ص*ي* ولكن تضعف دلالته على ما ا*تجوا به، على ما سبق تفصيله فى المطالب السابقة أهـ.

والله تبارك وتعالى أعلى وأعلم


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05-15-2017, 03:59 PM   #3
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